चूर-चूर January 15, 2019January 15, 2019 Rekha Sahay यह दुनिया यह ज़िंदगी सब अजनबी लगते हैं. एक आईना हीं था जो पहचानता था वह भी गिर कर चूर-चूर हो गया . Rate this:Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook More Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest Share on Tumblr (Opens in new window) Tumblr Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn Share on Pocket (Opens in new window) Pocket Share on Reddit (Opens in new window) Reddit Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Like Loading... Related
ज़िंदगी में ख़ुशियों के साथ दर्द भी तो है . जो कभी कभी छलक जाता है कविताओं में . LikeLiked by 1 person Reply
कुछ मेरी लापरवाही और कुछ मोबाईल से लिख कर Post करने की आदत …..पर ग़नीमत है आप जैसे सुधि ब्लॉग मित्र हैं, भूल बताने के लिए . बहुत बहुत आभार !! LikeLiked by 1 person Reply
*कोई कितना ही खुश-मिज़ाज क्यों न हो…!* *रुला देती है किसी की कमी कभी-कभी…!!* LikeLiked by 1 person Reply
बहूत दर्द है ईस कविता में।
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ज़िंदगी में ख़ुशियों के साथ दर्द भी तो है . जो कभी कभी छलक जाता है कविताओं में .
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पहनाता नही पहचानता शब्द का सही प्रयोग
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कुछ मेरी लापरवाही और कुछ मोबाईल से लिख कर Post करने की आदत …..पर ग़नीमत है आप जैसे सुधि ब्लॉग मित्र हैं, भूल बताने के लिए .
बहुत बहुत आभार !!
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अच्छा हुआ जो शीशा टूट गया
और मै अपने अक्स से दूर हुआ
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😊💐
आप मेरे शीशे को नहीं जानते ,
कुछ धुँधली सी परछाईं हीं दिखती थी .
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आपको अपना चेहरा पढना हो
तो औरों के चेहरे पढें।
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अच्छा सुझाव है। अब कोशिश करुगीं।
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जहेनसीब
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kya baat……behtarin panktiya.
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आभार आपका .
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*कोई कितना ही खुश-मिज़ाज क्यों न हो…!*
*रुला देती है किसी की कमी कभी-कभी…!!*
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हाँ सच है।
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बहुत हि बेहतरीन लिखा है आपने😊
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आभार शैंकी।
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