उम्र जाया कर दी लोगों ने औरों के
वजूद में नुक़्स निकालते- निकालते.
इतना ख़ुद को तराशा होता
तो फ़रिश्ते बन जाते .

— गुलज़ार
उम्र जाया कर दी लोगों ने औरों के
वजूद में नुक़्स निकालते- निकालते.
इतना ख़ुद को तराशा होता
तो फ़रिश्ते बन जाते .

— गुलज़ार
❤ ❤ Rumi
सुबह की कच्ची मीठी धूप
दिवस के बीतते प्रहर के साथ
रवि के प्रखर प्रहार से बेनूर आकाश से
तपती धरती पर आग का गोला बन
गर्दो गुबार से हमला करता है।
खुश्क हवाअों की चीखें….
कभी शोर करतीं, कभी चुप हो जातीं हैं।
जलाता हैं सबको मई- जून।
भङकता सूरज अौर धूल-धूसरित , खर-पतवार भरी हवा के बाद
बस इंतजार रहता शाम का या फिर बारिश का…..
दिली आभार उनका जिन्होंने जरुरत के समय
मदद के लिये हाथ बढ़ाया ।
पर उनका भी शुक्रिया
जिन्हों ने “ना” कहा।
हर “ना” ने खङा होना सिखाया।
कितनों का सच्चा रूप दिखाया ।
जरुरतमंद के लिये हाथ बढ़ाने का मोल समझ आया।
अौर
दिल ने कहा- “ना” वालों की
ज़िम्मेदारियोँ से तुम आज़ाद हो।
उनके लिये चिंतन करने के
दायित्व से मुक्त हो !!!
पुराने सामानों के बीच बैठ
यादों में सब ज़िंदा रखने की …..
बीते पलों को ज़बरदस्ती
वर्तमान में लाने की ……
कोशिश
वर्तमान और भविष्य को भी,
पुराने दर्द से भर देती है .
यादों- एहसासों से ,
भरे होने के एहसास
से अच्छा है –
सब धूम्र ग़ुबार में विलीन कर देना…….
आकाश में उठते धुएँ
के साथ सूनी पसरी पीड़ा
शून्य में शून्य होते देखना …….
