कैसी विडम्बना है कि माता-पिता विवाह के समय खुशी से पुत्री को अपनी सम्पत्ती से कुछ हिस्सा दें तो वह दहेज माना जाता है, जो कि एक सामाजिक बुराई समझी जाती है। इसके विपरीत बेटी कानून से सम्पत्ती में बंटवारा करवाकर हिस्सा मांगे तो कानूनन जायज।
क्योंकि कानून अंधा होता है।
मैं आपकी बातों से सहमत हूँ। दहेज की परंपरा इस वजह से हीं बनी होगी।
पर सच्चाई यह है कि दहेज, स्री धन नहीं रह गया है। यह प्रायः विवाहोत्सव में खर्च कर दिया जाता है अौर लङकी के पास धन नहीं रहता।
कैसी विडम्बना है कि माता-पिता विवाह के समय खुशी से पुत्री को अपनी सम्पत्ती से कुछ हिस्सा दें तो वह दहेज माना जाता है, जो कि एक सामाजिक बुराई समझी जाती है। इसके विपरीत बेटी कानून से सम्पत्ती में बंटवारा करवाकर हिस्सा मांगे तो कानूनन जायज।
क्योंकि कानून अंधा होता है।
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मैं आपकी बातों से सहमत हूँ। दहेज की परंपरा इस वजह से हीं बनी होगी।
पर सच्चाई यह है कि दहेज, स्री धन नहीं रह गया है। यह प्रायः विवाहोत्सव में खर्च कर दिया जाता है अौर लङकी के पास धन नहीं रहता।
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Thank you 🙂
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