काश -कविता

जिंदगी की ख्वाहिशों में, 

ना जाने कितने काश ,

शामिल हैं।

कुछ पूरे, कुछ अधुरे , कुछ खास …….

रुई से सफेद, बादलों से हलके  काश के फूलों की   तरह।

कुछ हवा के झोंकों में उङ गये।

कुछ आज भी पूरे होने के जिद में,

अटके हैं !!!!

 

 

 

काश / काँस  के फूल      –   मुझे कास के सफेद फूल’ हमेश से नाजुक अौर सुंदर लगते  हैं।  दशहरा  या शारदीय नवरात्र के आसपास ये जंगली फूल ताल, तलैया,  खेतों  के आसपास अौर जहाँ-तहाँ  दिखतें हैं।  काँस को देवी दुर्गा का स्वागत करता हुआ सुमन कहा जाता है । एक बार बङे शौक से इन फूलों को ला कर रखा। लेकिन जल्दी हीं ये हवा के झोंके के साथ पूरे घर में बिखर गये।   (   Saccharum spontaneum / wild sugarcane / Kans grass)

 

kash

 

37 thoughts on “काश -कविता

  1. काश——
    कुछ पुरे ,कुछ अधूरे,
    कुछ ख़्वाबों के जैसे,
    रात भर साथ मगर सुबह बिखर गए ,
    यही है जिंदगी,
    काश में उलझ गयी,
    काश के फूल,
    संग घर भी महक गयी।
    बहुत बढ़िया।अतिसुन्दर।

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    1. आपने मेरी कविता की तारीफ में बेहद सुंदर रचना लिख दी , धन्यवाद।

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      1. धन्यवाद आपका अच्छा लिखा आपने हमें भी दो लाईन जोड़ने की आपसे प्रेरणा मिल गयी।

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      2. आप बहुत अच्छा लिखतें हैं। आपकी लिखी पंक्तियाँ बङी सुंदर हैं।

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