जिंदगी के रंग (1) ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें ( कविता )

tree

ज़िंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें
दूर खड़ा फूलों भरा, हरा भरा,

पुराना दरख्त समीर के झोंकों में झूम रहा था।
नीचे खेलते बच्चे किलक रहे थे।
ड़ालों पर पंछी चहक रहे थे।
जिंदगी के रंग कितने सलोने है।

तभी पेड़ चीख़ उठा। उस से भी तेज़ चीख़ें आईं
ऊपर नीड़ों से, और गोल-गोल उड़ते पंछियो की।
कोई उसे बेरहमी से काट रहा था,

शायद सीमेंट-बालू के नीड़ बनाने के लिए।
आसपास के पेड़ सन्न देख रहे थे,
क्या इसके बाद हमारी बारी है? सोच रहे थे।
पेड़ धरा पर पड़ा था, फूल टूट-टूट कर बिखर गए थे।

हमें हमेशा लगता है, दुर्घटनाएँ दूसरों के साथ हीं होते है
पर ऐसा नहीं है। जिंदगी रोज़ नए रंग दिखाती है हमें।
हम हीं भूल जाते है, कभी-कभी गहरी जड़ें भी सहारा नहीं दे पातीं हैं हमें,

image from internet.

केलौग्स चौकोज के साथ खुल जाए बचपन, खिल जाए बचपन ( Blog related topic )

बात कुछ पुरानी है। तब मेरी मेरी दोनों बेटियाँ छोटी-छोटी थीं। छोटे से बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करना कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी है, यह एक माँ ही बता सकती है। कुछ ऐसी ही मेरे भी कहानी है।

तब दोनों बेटियाँ स्कूल में पढ़तीं थी। मैं भी नौकरी करती थी। इसलिए सुबह घर में बड़ी भाग -दौड़ रहती थी। दोनों को तैयार करना, टिफ़िन देना, फिर उन्हें नाश्ता करवा कर समय पर रवाना करना बहुत बड़ा काम होता था। इसके साथ हीं मुझे भी तैयार होना पड़ता था। ताकि मुझे अपने स्कूल जाने में देर ना हो जाये।

इन बातों का मतलब यह है कि तब सुबह का हर पल मूल्यवान होता था। किसी छोटे बच्चे की माँ को मैनेजमेंट के कोर्स में पढ़ाये जानेवाले समय प्रबंधन और बहुकार्य या मल्टीटास्किंग सिखाने की जरूरत नहीं होती है। वह छोटे बच्चों के पीछे भाग-भाग कर अपने आप सब सीख जाती है। कुछ वही हाल मेरा भी था। इन सारे कामों में सबसे कठिन काम था दोनों को नाश्ता करवाना और दूध पिलाना। रोज़ दोनों दूध नहीं पीने के किसी नए बहाने के साथ तैयार मिलतीं।

तभी मुझे मेरे एक सहेली नें केलौग्स चौकोज का नया पैकेट दिखाया। उसने बताया कि यह बच्चों को यह बड़ा पसंद आता है। मैंने पैकेट पर लिखे पोषण तत्वों को ध्यान से पढ़ा। इस पर लिखे विटामिन ए, सी, प्रोटीन, कैल्सियम, आयरन और कैलोरी की जानकारी पढ़ कर मैं खुश हो गई। इसमें चाकलेट का स्वाद और मिठास भी थी। बस, मैं बाज़ार से तुरंत एक पैकेट केलौग्स चौकोज खरीद कर ले आई। मन हीं मन खुश हो रही थी, चलो अब बेटियों को स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता देना आसान हो गया। समय की बचत और बच्चों का मनपसंद नाश्ता भी, मतलब एक पंथ दो काज।

अगली सुबह खुशी-खुशी मैंने दो बॉल में दूध दिया और उस पर केलौग्स चौकोस डाले। पर यह क्या? दोनों बेटियों ने नई चीज़ देख कर मुँह बना लिया। मेरे तो होश उड़ गए। मैंने उनके लिए कुछ और नाश्ता बनाया ही नहीं था और अब कुछ और  बनाने का समय भी नहीं था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था अब क्या करूँ? तभी मुझे एक तरकीब सूझी। मैंने उन्हे एक कहानी सुनाना शुरू किया – राजा रानी की कहानी । मैंने उनसे कहा, दूर एक देश है। जिसे इग्लैंड या यूनाइटेड किंगडम कहते हैं। वहाँ आज भी राजा-रानी और राजकुमार होते हैं। यह केलॉग्स राजा रानी और राजकुमारों के देश से आया है। मैंने कनखियों से देखा वे ध्यान से कहानी सुन रहीं थी। मैंने चम्मच से खिलाना शुरू किया और फिर धीरे से चम्मच उनके हाथों में पकड़ा दिया। दोनों को स्वाद पसंद आया। तभी छोटी बेटी पूछ बैठी -” मम्मी, क्या वहाँ का राजकुमार भी यह केलॉग्स चौकोज़ खाता है।” अब दोनों के प्रश्न खत्म ही नही हो  रहे थे, पर नाश्ता झट से खत्म हो गया। मेरे जान में जान आई। अब तो दोनों केलॉग्स चौकोज़ को राजकुमार वाला नाश्ता ही बुलाने लगीं और बिना नाज़-नखरा अपने से मांग कर खाने लगीं।

वास्तव में मैंने कहीं पढ़ा था कि केलॉग्स का सबसे बड़ा कारखाना यूनाइटेड किंगडम के ट्रैफर्ड पार्क, मैनचेस्टर में है और केलॉग एक रॉयल वारंट रखती है, जो उसे एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस ऑफ वेल्स से प्राप्त हुआ था। इसे हीं कहानी बना कर मैंने उन्हें सुना दिया था।

अब दोनों बेटियाँ बड़ी हो कर इंजीनियर बन चुकी हैं। बड़ी बेटी को मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद, अभी हाल में विदेश जाने का अवसर मिला। वह वहाँ से मेरे लिए अनेक विदेशी उपहार  ले कर लौटी और साथ में ले कर आई केलौग्स चौकोज का डब्बा। उसने हँस कर मुझ से कहा – ” मम्मी, राजकुमारों वाला केलौग्स चौकोज  उसके हीं देश से ले कर आई हूँ। मेरी  आँखों के सामने उनके  बचपन के  “खुशी के  पल” नाच उठे।

https://www.facebook.com/mychocos.

किराये का चांडाल पुत्र ( कहानी )

banaras

नयना का सपरिवार बनारस घूमने का पहला अवसर था। दोनों बेटियों और पति के साथ बड़ी कठिनाइयों से यह कार्यक्रम बन पाया था। सुबह, सबसे पहले गंगा स्नान कर वे चारो विश्वप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर पहुँचे और पूजा-अर्चना किया। बनारस के विभिन्न मंदिरों और पर्यटन स्थलों को घूमने में दो दिन कैसे निकल गए, उसे पता हीं नहीं चला।

यहाँ आ कर नयना को, पिंजरे से आज़ाद परिंदे जैसा अहसास हो रहा था। उसे वापस घर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी। अतः उसने काशी प्रवास और बढ़ा लिया। काशी आ कर गंगा में नौका विहार नहीं किया तो यात्रा अधूरी होगी। जबकी, उसके पति को रुकने का मन बिलकुल नहीं था।

नयना की शादी कम उम्र में हो गई थी। तब उसकी पढ़ाई भी अधूरी थी। ससुराल वाले और पति उसे काम करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझते थे। विशेष कर उसकी जेठानी उसे बड़ा परेशान करती थी। नयना का अकर्मण्य, मोटा पति हितेश, अक्ल से भी मोटा था। अतः भाभी के आँचल के पल्लू से बंधा रहता। भाभी सुगमता से अपने देवर को अपनी अंगुलियों पर नचाती रहती। वह अपनी कमाई से मात्र सौ रुपए नयना को देता और बाकी सारी कमाई माया यानि भाभी के कालिमायुक्त, कलुषित चरणों में चढ़ा देता। ना जाने छोटी कुटिल आँखों वाली कदर्य माया भाभी में नयना के पति को क्या सौंदर्य दिखता था।

तब तक नयना से अनजाने में भूल हो गई। एक-एक कर वह दो पुत्रियों की जननी बन गई। सारा ससुराल उससे नाराज़ हो गया। पुत्रवती भाभी का जादू उसके मूढ़ पति के सर चढ़ कर बोलने लगा। घर का सारा धन और पुश्तैनी जायदाद धीरे-धीरे माया को चढ़ावा में चढ़ता गया। नयना जब पति को बेटियों के भविष्य के बारे में समझाना चाहती, उसका पति उसके ऊपर तरह-तरह के दोष मढ़, नयना से नाराज़ हो, माया भाभी के साथ कोप भवन में चला जाता था।

नयना ने जेठ की तरफ एक दो बार आशापूर्ण निगाहों से देखा। पर कुछ काम ना करनेवाले जेठ अपनी पत्नी की योग्यता से बड़े प्रभावित थे। जिसने सोने की अंडा देनेवाली मुर्गी अर्थात नयना के सरकारी पदाधिकारी, पति को अपने वश में कर रखा था। नयना ने जहां भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया, कोरे आश्वासन के अलावा कोई मदद नहीं मिली। तब नयना ने सारे अत्याचार, बेटियों के भविष्य की वजह से झेलना स्वीकार कर लिया। नयना ने अपनी पढ़ाई बड़ी कठिनाईयों से पूरी की तथा  नौकरी करने लगी। जिस से बेटियों की पढ़ाई ठीक से चल सके। पर पति और माया भाभी का तोता- मैना प्रेम कथा प्रकरण चलता रहा।

ऐसी  कालिख की कोठारी से दो-तीन दिन के लिए बाहर निकल कर नयना को बड़ी शांती मिल रही थी। मान्यतानुसार शिव की त्रिशूल पर बसा बनारस, शांति और आध्यात्म की नगरी है। जहां ज्योतिर्लिंग, शक्ति पीठ और गंगा एक साथ हैं। यह दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक है। नयना, गलियों में बसे बनारस के अनोखे आकर्षण में उलझ कर रह गई। बनारसी और रेशमी कपड़ों के अद्भुत संसार  जैसे उसे एक नई दुनिया में ले गए । गंगा तट पर सैकड़ो घाट है। नौका विहार के समय नाविक सारे घाटों के बारे में बतला रहा था। तभी नयना के पति को माया भाभी का फोन आया।

किनारे माणिकर्णिका घाट नज़र आ रही थी। जहाँ अनेकों चिताएँ जल रहीं थीं। नयना ने किनारे दिख रहे एक आलीशान भवन के बारे में जानना चाहा। नाविक ने बताया कि यह डोम राजा का महल है। डोम राजा पारंपरिक रूप से शमशान घाट के कर्ता-धर्ता और स्वामी होतें हैं। साथ हीं वे श्मशान में चिताओं को दिया जानेवाली अग्नि के  संरक्षक होते है। उसके अनुमति से अग्नि प्राप्त की जाती है और चिता जलाया जाता है। यह परंपरा राजा हरिश्चंद्र के समय से चल  रही है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार एक चाण्डाल ने सत्यवादी राजा हरिशचंद्र को खरीद अपना दास बना लिया था। वह चांडाल मणिकर्णिका घाट का स्वामी था। उसने राजा हरिशचंद्र को इस घाट पर अन्त्येष्टि करने वाले लोगों से “कर” वसूलने का काम दिया था।

जलती चिताओं को देखते हुए, नयना के पति ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि चूंकि नयना ने पुत्रजननी न बनने का अक्षम्य अपराध किया है। अतः मरने पर उन्हें कोई आग देनेवाला नहीं है। माया भाभी एक बड़ा उपकार करने के लिए तैयार है। नयना और हितेश  के  मरने पर उनकी  चिता को आग माया भाभी अपने पुत्र से दिलवा देगी। बदले में अभी अपनी सारी चल-अचल संपाति माया के पुत्र के नाम करना होगा। माया भाभी चाहती है कि यह काम जल्दी हो जाये। इसलिए हमें तत्काल वापस लौटना होगा।

नयना  और उसकी  युवा बेटियाँ हैरान उस कलुषित हृदय के व्यक्ति का चेहरा देख रहीं  थीं। नयना को  ख़्याल आया कि अभी तो मैं जिंदा हूँ। फिर मेरे अग्नि संस्कार की जल्दी  क्यों? और माया अपने पुत्र से  किराये ले कर  अग्नि दिलवाने के लिए क्यों तैयार है? इसके पीछे मात्र धन की लालसा है या कुछ और सत्य छुपा है ? दो लायक, होनहार और सुंदर इंजीनियर पुत्रियों का पिता इतना निर्दयी, नासमझ और नीच हो सकता है क्या? सिर्फ इसलिए कि वे बेटियाँ हैं? क्या वे बेटियाँ पिता को इस व्यवहार के लिए  क्षमा कर पाएँगी?

कहते हैं जाति और उसके साथ जुटे कर्म, जन्म से प्राप्त होते हैं। पर यहाँ तो अपनी ही स्वार्थी और लालची जननी, माया भाभी ने अपने पुत्र के नये  कर्म  को नियत कर दिया था – एक श्मशान चांडाल की रूप में।नयना ने सोंचा,  अगर अगली बार बनारस दर्शन का अवसर मिला, तब माणिकर्णिका घाट पर या डोम राजा के विशाल प्रासाद के नीचे मायावी माया भाभी का होनहार सुपुत्र चिता में आग देने के लिए, हाथों में अग्नि मशाल ले, किराये का पुत्र बनने को तत्पर दिखेगा। पुत्रविहीन माता-पिता के अंतिम संस्कार के लिए किराये का पुत्र सरलता से उपलब्ध होगा। किराये के बोर्ड पर लिखा होगा उसके किराये के रेट।

***

वर्षों बाद नयना को पुनः बनारस जाने का अवसर मिला है। पुरानी सारी बातें चलचित्र की तरह याद आने लगीं। उसे एक बार पुनः माणिकर्णिका घाट देखने की कामना हो रही थी। वह घाट जहाँ पार्वती जी ने अपने कान की मणी छुपाई थी, ताकि यायावर और घुमक्कड़ शिव उसे खोजतें रहें  और उनके साथ पार्वती को ज्यादा वक्त व्यतित करने का अवसर मिल सकें।

नयना ने अपने मणी का भी यहीं परित्याग किया था। वह पति के साथ उसकी आखरी यात्रा थी। उसके बाद वह बेटियों के साथ उनके नौकरी के स्थान पर चली गई थी और फिर कभी हितेश के पास वापस नहीं लौटी। कुछ दिनों बाद उड़ती -उड़ती खबरें ज़रूर सुनने में आईं थीं कि माया भाभी ने सारे रुपये और जायदाद ले कर, हितेश को उसके ही घर से बाहर कर दिया था.
अभी वह गलियों से गुजर कर घाट की ओर बढ़ रही थी कि उसके कदम थम गए। दोनों बेटियों और दामाद ने देखा, सामने अर्ध विक्षिप्त भिक्षुक के रूप में हितेश भिखारियों की पंक्ति में बैठा है।

 

image taken from internet.

बगुला भगत ( कहानी )

crane

यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है।

 इस कहानी पर पाठकों के विचार सादर आमंत्रित है।

खूब गोरा रंग, ऊँची कद काठी, तीन भाईयों की प्यारी बहन और माँ-पापा की लाड़ली बेटी थी वैदेही । अगल-बगल की गलियों में ना जाने उसकी कितनी सखी-सहेलियाँ रहतीं थी। उसका सारा दिन सहेलियों के साथ हुड़दंग करने में बीतता। कभी गोलगप्पे, कभी दही भल्ले या आलू टिकिया खाना या फिर छत पर बैठ गप्पें करना उस के पसंदीदा शगल थे। हाँ गप्प के साथ बुनाई और क्रोशिये का काम भी चलता रहता।

रात को जब बड़े भईया और पापा के घर आने का समय होता, वैदेही अपने टेबल पर किताबें खोल कर ऐसा शमा बाँध देती, जैसे सारा दिन पढ़ाई कर रही हो। पर उसके कान और आँखें लगे होते गली की ओर। पहले मंजिल की उसकी कमरे की खिड़की से जैसे ही भैया दूर गली के कोने पर नज़र आते, वह सीढ़ियाँ कूदती-फाँदती दरवाजा खोलने पहुँच जाती। बड़े भईया रोज़ कुछ ना कुछ लिए हुए घर पहुँचते- जलेबी, गर्म समोसे, मिठाईयाँ, फल या चॉकलेट। जो वे हमेशा प्यार से वैदेही को हीं पकड़ाते थे।

उस दिन भईया के हाथों में कुछ ज्यादा हीं सामान था और साथ में था एक नवयुवक – रणजीत। वह भईया के आफिस में काम करता था। भईया और पापा उसके शांत स्वभाव और कर्मठ व्यवहार से बड़े खुश थे। जल्दी हीं वैदेही सारा माज़रा समझ गई। यह सब उसके विवाह की तैयारी थी। वह भी खुश थी, जैसे इस उम्र की हर लड़की शादी के नाम से होती है। दोनों परिवार एक दूसरे से मिले और जल्दी हीं शादी हो गई। विवाह के बाद भईया ने मदद कर रणजीत का अलग व्यवसाय करवा दिया। व्यवसाय बड़ा अच्छा चल निकला।

शादी के बाद, कुछ दिनों में हीं वैदेही को पता चल गया कि रणजीत का शांत स्वभाव, वास्तव में तूफान के पहले की शांती थी। दरअसल वह बड़ा हीं गुस्सैल स्वभाव का था। पीना-पिलाना और देर रात तक ताश खेलना उसके रोज़ के नियम थे। नशे में वह अपना आपा और भी खो देता। रोज़ का झगड़ा और हो हल्ला दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था। इस बीच वैदेही तीन पुत्रों और एक पुत्री की जननी बन चुकी थी। पापा के गुजर जाने की वजह से उसे भईया-भाभी या माँ को यह सब बताने में हिचक होती थी। उसे यह भी लगता था, शायद समय के साथ रणजीत में सुधार आए। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

रणजीत को समझाने की वैदेही की कोशिश आग में घी का काम करती। वैदेही को नए कपड़ों और साड़ियों का बड़ा शौक था। हाथ में पैसे आते हीं वह भोला के दुकान से नई-नई साड़ीयाँ खरीद लाती। एक रात नशे में रणजीत ने हद कर दी। गुस्से में रणजीत नें वैदेही के सारी दामी कपड़े और साड़ियाँ इकट्ठे कर आग के हवाले कर दिये। वैदेही बड़े होते बच्चों के सामने तमाशा नहीं करना चाहती थे। पर ये बातें रणजीत की समझ में नहीं आती थीं।

दिन भर खुशमिजाज़ दिखने वाली वैदेही अंदर हीं अंदर घुलती रहती। अपनी सहेलियों को कुछ भी बताने से हिचकती थी। पर दीवारों के भी कान होते हैं। सारा आस पड़ोस बिना टिकट रोज़ का यह नाटक देखता था। एक रात रणजीत ने आने में बहुत देर कर दी। वैदेही का दिल धड़कने लगा। नशे में कहीं कुछ हो तो नहीं गया? लगभग आधी रात रणजीत घर पहुँचा। चिंतित वैदेही उस से देर से आने का कारण पूछने की भूल कर बैठी।
नशे में चूर रणजीत ने गाली-गलौज, हंगामा और झगड़ा शुरू कर दिया । बच्चे आँखें मलते जाग गए। रौद्र रूप धारण किए पति ने वैदेही को धक्के मार कर घर से बाहर कर दिया। बच्चों ने रोकना चाहा। उन सब को भी आधी रात में रणजीत ने घर से बाहर कर दिया। पीने-पिलाने के चक्कर में व्यवसाय का भी बुरा हाल था।

बड़ी होती बेटी और तीन बेटों की माँ आज असहाय अपने घर के बाहर आधी रात के समय लाचार खड़ी थी। दो-चार दिन अपने मायके में रह कर वह वापस लौटी। तब पता चला कि रणजीत को किसी केस की वजह से पुलिस खोज रही है। अतः वह फरार है। रणजीत के ना रहने से घर में शांती तो बहुत थी। पर पैसों के बिना घर चलना मुश्किल हो गया। पर कहते हैं ना कि ईश्वर सब सहने की हिम्मत देता है। एक ही रात में वैदेही के चारो बच्चे जैसे सयाने और समझदार हो गए। चारों ने अपनी योग्यतानुसार जो भी काम मिला करने लगे। वैदेही ने भी बुनाई-कढ़ाई जैसे काम शुरू कर दिये।

उनके पास जो था, जैसा था। उसमें हीं खुश थे। अब उन सब की जिंदगी सुकून भारी थी। तभी अचानक वैदेही की बेटी रौशनी के लिए अपने आप एक अच्छा रिश्ता आया। घर में खुशी की लहर दौड़ गई। शादी की तिथी पास आने लगी। अपने गहने बेच कर वैदेही ने पैसों का इंतज़ाम किया। बेटों ने अपनी-अपनी नौकरी से भी कुछ अग्रिम पैसे ले लिए थे। लड़के वालों की कोई फर्माइश नहीं थी। पर शादी का खर्च तो था हीं।

तभी एक विचित्र बात हुई। अचानक रणजीत घर वापस आ गया। परंतु उसका रूप-रंग बदला हुआ था। वह गेरुए धोती-कुर्ते में था। हाथों में था एक लंबा त्रिशूल, गले में लंबा रुद्राक्ष माला, लालट पर भभूत और पैरों में खड़ाऊँ। चेहरे पर कभी शिकन ना लानेवाली वैदेही को समझ नही आ रहा था कि सन्यासी पति के प्रत्यागमन पर वह रोए या हँसे।

चार बच्चों के साथ, बीच मझधार में वैदेही को अकेले छोड़ देने वाले पति ने उसे बताया कि वह बदल चुका है। अब वह परिवार में बच्चों के साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहता है। जब रात में वह जमीन पर कंबल बिछा कर सोने लगा, तब वैदेही को उस पर दया आ गई। वैदेही ने जानना चाहा कि इतने सालों तक वह कहाँ था। पूरी रात रणजीत अपनी दुख और कष्ट भरी कहानी सुनाता रहा। उसकी कितनी कठिन जिंदगी थी। उस रात नशे में तेज़ चलाते बाईक से दुर्घटना हो गई और उस व्यक्ती की वहीं मृत्यु हो गई। पुलिस से छुपने के कोशिश में वह घर से फरार हो गया।वह पहचाना ना जा सके, इसलिए उसने दाढ़ी-मूंछे बढ़ा ली थीं। भटकते-भटकते वह ईश्वर के द्वार, हरिद्वार पहुँचा। वहाँ वह गंगा तट पर गुरु जी से मिला। वैदेही के साथ किए गए अन्याय और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए बीमारों, कोढ़ियों और गरीबों की सेवा करता रहा इतने वर्षों तक। अब उसने सभी बुरी आदतें छोड़ दीं है।

रणजीत ने अगले दिन से बाज़ार के काम और सब्जियाँ लाने जैसे काम अपने जिम्मे ले लिया। जिंदगी पटरी पर आ गई थी। सभी बड़े खुश थे। बच्चे पिता के बदले रूप और स्वभाव से प्रसन्न थे। वैदेही शादी के कामों में उलझी थी। विवाह की पूर्वसंध्या पर संगीत कार्यक्रम में सभी व्यस्त थे। नाच -गाने का उल्लासपूर्ण माहौल था। तभी वैदेही को उनकी प्रिय सहेली ने इशारे से बुलाया।

वह वैदेही को चुप रहने का इशारा कर आपने साथ पीछे के गैरेज की ओर ले गई। जो प्रायः खाली और बंद पड़ा रहता था। द्वार के दरार से वैदेही ने देखा, रणजीत शराब पीने में व्यस्त है और अपने किसी मित्र से कह रहा है –“ यह मेरा सुरक्षित कमरा है। यहाँ पीने पर किसी को शक नहीं होता है। हाँ, मुझे पैसों की तंगी तो होती है। पर हाट-बाज़ार से पैसे बचा कर बोतल खरीद लाता हूँ। सोचता हूँ, कल रोशनी की बारात आने के ठीक पहले पीने का नाटक कर वैदेही से दस-बीस हज़ार रुपए झटक लूँगा। मैंने उसके पास काफ़ी रुपये देखे हैं।“ गेरुए वस्त्रधारी बगुले भगत का असली रूप देख वैदेही सन्न रह गई। उसे लगा, धरती फट जाये और वह भी सीता की तरह उसमें समा जाये।

उसके चेहरे पर घबराहट छा गई। यह कैसा पिता है, जो अपनी बेटी का शत्रु है। वह गैरेज की ओर आगे बढ़ी। तभी उसकी सहेली ने उसे हाथ पकड़ कर खींच लिया। दोनों ने कुछ बातें की और वैदेही के चेहरे पर कुछ निर्णायक भाव आ गए। अगले दिन शाम में शादी की भीड़-भाड़ अपने सबाब पर थी। दुल्हन बनी रोशनी बड़ी सुंदर लग रही थी। तभी नशे में झूमता रणजीत वैदेही से उज्जड तरीके से शराब खरीदने के लिए पैसे माँगने लगा।

तत्काल वैदेही ने बेटों से कह कर रणजीत के लिए शराब की बोतलें मँगवा दिया । तुरंत पैसे लाने का आश्वासान देते हुई रणजीत को शान्त रहने का निवेदन करने लगी । अपना काम इतनी सरलता से बनता देख रणजीत खुश हो गया और गटागट पीना शुरू कर दिया। वैदेही का तीर ठीक निशाने पर लगा था। थोड़ी देर में रणजीत नशे में चूर हो गया।तीनों बेटों ने उसे चुपचाप पीछे के उसी गैरेज में ड़ाल,बाहर से ताला बंद कर दिया।

रोशनी की शादी उसके अकर्मण्य पिता के अनुपस्थिती में बड़े अच्छे से सम्पन्न हो गया। अगले दिन उसकी बिदाई होने के बाद सभी मेहमानों को बिदा कर वैदेही  गैरेज के पास पहुँची। बेटों ने ताला खोला। रणजीत का नशा उतार चुका था। पर उस की आँखें अभी भी लाल थीं। बिखरे बाल, मुँह से शराब की दुर्गंध उसके चेहरे को कदर्य और भद्दा बना रही थीं।

अपना वार खाली जाते देख बौखलाया रणजीत, पहले की तरह झगड़े और मार-पीट पर उतारू हो गया। पर तभी वहाँ पुलिस आ गई। वैदेही को पुलिस अफसर ने धन्यवाद देते हुए कहा –“ आपने इसकी सूचना हमें दे कर अच्छा किया । बहुत दिनों से पुलिस इसे नशे में एक्सिडेंट करने की वजह से खोज रही थी। हरिद्वार की एक महिला ने भी इस पर केस दर्ज किया है। उस महिला ने बताया कि रणजीत ने हरिद्वार में उस से झूठ बोल कर विवाह किया था। कुछ साल उसके साथ बीताया। कुछ महीनों पहले उसके रुपये और गहने चोरी कर फरार हो गया था।

वैदेही आज बड़ा हल्का महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था, काश वह पहले इतनी हिम्मत जुटा कर रणजीत को अपनी जिंदगी से बाहर कर पाती। 

 

images taken from internet.

महाभारत के लेखक और व्यास के सहायक – भगवान गणेश (महाभारत की दिलचस्प कहानियाँ )

ved

गवान ब्रह्मा चाहते थे कि भारत के दर्शन, वेद तथा उपनिषदों का ज्ञान लुप्त नहीं हो और धर्म क्षीण न हो जाये। इसलिए ब्रह्मा ने ऋषि वेद व्यास को भारत की कथा यानि महाभारत लिखने की प्रेरणा दी। विष्णु के अवतार, वेदव्यास महाभारत की घटनाओं के साक्षी थे। साथ ही वे वेदों के भाष्यकार भी थे। वेदों को उन्होने सरल भाषा में लिखा था। जिससे सामान्य जन भी वेदों का अध्ययन कर सकें। उन्होने अट्ठारह पुराणों की भी रचना की थी।

वेद व्यास एक महान कवि थे। ब्रह्मा के अनुरोध पर व्यास ने किसी लेखक की कामना की जो उनकी कथा को सुन कर लिखता जाये। श्रुतलेख के लिए व्यास ने भगवान गणेश से अनुरोध किया। गणेश जी ने एक शर्त रखी कि व्यास जी को बिना रुके पूरी कथा का वर्णन करना होगा। व्यास जी ने इसे मान लिया और गणेश जी से अनुरोध किया कि वे भी मात्र अर्थपूर्ण और सही बातें, समझ कर लिखें।

स तथ्य के पीछे मान्यता है कि महाभारत और गीता सनातन धर्म के सबसे प्रामाणिक पाठ के रूप में स्थापित होने वाले थे। अतः बुद्धि के देव गणेश का आशीर्वाद महत्वपूर्ण था।

किवदंती है कि व्यास जी के श्लोक गणेश जी बड़े तेजी से लिख लेते थे। इसलिए व्यास जी कुछ सरल श्लोकों के बाद एक बेहद कठिन श्लोक बोलते थे। जिसे समझने और लिखने में गणेश जी को थोड़ा समय लग जाता। जिस से व्यास जी को आगे के श्लोक और कथा कहने के लिए कुछ समय मिल जाता था। भगवान गणेश ने ब्रह्मा द्वारा निर्देशित कविता “महाभारत” को दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य कहलाने का आशीर्वाद दिया।

भारत और भारत के लोगों  की इस वृहद कहानी में अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास , भूगोल, ज्योतिषशास्त्र, तत्वमीमांसा , कामशास्त्र जैसे विषयों के साथ भौतिक जीवन की नि:सारता का गीता संदेश भी शामिल है। इसलिए भारत की यह कहानी महाभारत कहलाई।

 

 

image from internet.

लुप्त सरस्वती नदी – वैदिक ज्ञान का लोप और कृष्ण द्वयपायन द्वारा पुनः संरक्षण ( महाभारत की रोचक कहानियाँ )

saraswati-river

पौराणिक कथा के अनुसार 12 वर्ष के भयंकर सूखे से सरस्वती नदी  शुष्क हो तिरोहित हो गई। इसका गहरा  प्रभाव मानव जाति पर पड़ा। 

 इस दौरान मानव, मात्र अपने जीवित रहने के प्रयास में ज्ञान से दूर होता गया। इस नदी के तट पर यज्ञ-पूजन करने वाले ऋषीगण  और लोग, भयंकर आकाल के कारण  यहाँ से पलायन कर गए। इस भयंकर आकाल ने सरस्वती नदी के साथ वेद  के ज्ञानों को भी  लुप्त कर दिया।

  सरस्वती ही तब विशालतम, परम पवित्र ,और मुख्य नदी थी।  ऐसा वर्णन वेद, पुराण रामायण, महाभारत, वैदिक सभ्यता आदि में मिलता  है।

     यह देख महर्षि पराशर के पुत्र और भगवान ब्रह्मा के अवतार, वेद व्यास या कृष्ण द्वयपायन ने पुनः सभी ज्ञानपूर्ण वेदों को जमा, संकलित और सरल भाषा में रचित किया । इसे चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद में पुनः जन सामान्य के सामने प्रस्तुत किया। ताकि पुनः  समाज का  निर्माण हो सके। इन्होने वेदों को सरल, और जन साधारण की भाषा में लिखा। जो भाष्य कहलाए और द्वयपायन वेद व्यास कहलाने लगे । 

ऋग्वेद के नदी सूक्त के अनुसार यह पौराणिक नदी पंजाब के पर्वतीय भाग से निकलकर कुरुक्षेत्र और राजपूताना से होते हुए प्रयाग या इलाहाबाद आकर यह गंगा तथा यमुना में मिलकर पुण्यतीर्थ त्रिवेणी कहलाती है। मान्यता है कि आज भी प्रयाग में यह अंत:सलिला है यानि धरती के  अंदर ही अंदर  बहती है।

वर्तमान सूखी हुई सरस्वती नदी के समानांतर खुदाई में ५५००-४००० वर्ष पुराने शहर मिले हैं जिन में पीलीबंगा, कालीबंगा और लोथल भी हैं। यहाँ कई यज्ञ कुण्डों के अवशेष भी मिले हैं, जो महाभारत में वर्णित तथ्य को प्रमाणित करते हैं।

कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि भीषण भूकम्पों के कारण  सरस्वती लुप्त हुईं हैं। ऋग्वेद तथा अन्य पौराणिक वैदिक ग्रंथों में दिये सरस्वती नदी के सन्दर्भों के आधार पर कई भू-विज्ञानी मानते हैं कि हरियाणा से राजस्थान होकर बहने वाली मौजूदा सूखी हुई घग्घर-हकरा नदी प्राचीन वैदिक सरस्वती नदी की एक मुख्य सहायक नदी थी।

 

 

 

image from internet.

 

 

 

#Honey Diet अम्बरिय मधुर आहार – मधु

 

त्रिदोष नाशक शहद को अमृततुल्य माना गया है। लगभग सभी धर्मों में किसी ना किसी रूप में मधु के उपयोगिता की चर्चा की गई है। हिन्दु धर्म के सभी धार्मिक अवसरों पर प्राय इसे उपयोग में लाया जाता है। इस्लाम में इसे सर्वरोग निवारक माना गया है। यूनानी और यहूदी धर्मों में शहद को अतिमूल्यवान और स्वस्थवर्धक कहा गया है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा शास्त्र शहद को ऊर्जादायक और स्वास्थवर्धक मानता है। महत्वपूर्ण आहार और खाने-पीने  की चीज़ों को धर्मों के साथ इसलिए जोड़ा जाता है, ताकि हम सभी उसका उपयोग किसी ना किसी रूप में हमेशा करते रहें।

उत्पादन– शहद प्रकृतिक प्रदत, खुबसूरत पुष्पों से प्राप्त होता है। मधुमक्खियाँ फूलों के रसों से मधु का निर्माण करती हैं। अक्सर मधुमक्खियाँ छत्ते बना कर  उसमें शहद जमा करती हैं। साथ ही मधुमक्खियों का पालन कर के  भी शहद प्राप्त किया जाता है।

रूप रंग स्वाद – यह हल्के या गहरे खुबसूरत अंबरी रंग का होता है। इसकी अपनी एक खुशबू होती है। इसकी खुशबु पुष्प स्रोत पर भी  निर्भर करती है। यह मीठा और हल्का सा कसाय स्वाद का होता है।

औषधिय उपयोग – यह रक्तवर्धक, ऊर्जादायक, संक्रमण कम करने वाला होता है। घाव, सूजन, दर्द और जलने में इसका उपयोग बड़ा फायदेमंद होता है। यह पाचन क्रिया में मदद करता है।

सौंदर्य वर्धक – सौंदर्यवर्धन में  शहद बहुत लाभदायक  होता है। यह विभिन्न सौंदर्य उत्पादनों और फेसियलों आदि  में काम में लाया जाता है। यह त्वचा को नमी प्रदान कर युवा बनाता है।

आहार के रूप में उपयोग – हमारे देश में मधु ज़्यादातर औषधि के रूप में प्रयुक्त होता रहा है। अब इसे आहार के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा है। चीनी के स्थान पर शहद का प्रयोग ज्यादा फायदेमंद है अतः  आज कल चीनी के स्थान पर शहद का प्रचलन बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है।

मेरे व्यक्तिगत अनुभव
मेरे जीवन में शहद किसी ना किसी रूप में हमेशा शामिल रहा है। मेरे दिन की शुरुआत सुबह गुनगुने जल में नींबू और शहद से होती है। यह मेद कम करता है और विजातीय पदार्थ या टॉक्सिन हटाता है। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब उंगली पर पतले मलमल का कपड़ा लपेट कर उसमें शहद लगा कर मैं अपने नवजात शिशु के जीभ और मुँह की  सफाई करती थी। छोटे बच्चों के दाँत निकलने के समय मसूढ़ो पर शहद मालिश करती। जिस से आसानी से दाँत निकलते जाते थे और संक्रामण का भी भय नहीं होता था। शहद के मीठे स्वाद के कारण बच्चे इस उपचार का मज़ा लेते थे। उनके पीने के पानी के साथ कुछ बुँदे शहद देते रहने से यह रक्तवर्धक का काम करता है। हमारे यहाँ रोटी के साथ, सलाद में ड्रेसिंग के रूप में, आइसक्रीम पर कुछ बूंदें, दूध के साथ, चीनी के बदले , मीठे व्यंजनों  के रूप में प्रत्येक दिन भोजन में शहद हमारा साथी रहता है। दरअसल मैं आहार में पोषक तत्वों से समझौता नहीं करना चाहती हूँ।

इतना ही नहीं मैं शहद का प्रयोग चेहरे और आँखों में आँजने के लिए   भी करती हूँ। कुछ देर शहद लगा कर धो देने से त्वचा मुलायम और नमीयुक्त रहती है और आँखें स्वच्छ हो जाती हैं। पर यह आवश्यक है कि शुद्ध, स्वच्छ, साफ और उचित प्रकार से छने  हुए शहद का प्रयोग किया जाय।

पहले शहद बहुत मूल्यवान और अल्प प्राप्य   होता था क्योंकि यह कम मात्रा में उपलब्ध था। तब इसे प्रकृति की देन मानी जाती थी। अतः सामान्य जन तक इसकी पहुँच पूजन सामग्री या औषधि रुप में हीं थी। अक्सर शहद के नाम पर नकली शहद बेची जाती थी। पर अब  मधुमक्खी पालन उद्योग के द्वारा शहद अधिक रूप में तैयार किया जाने लगा है। साथ ही बड़ी-बड़ी भरोसेमंद कंपनियाँ जैसे डाबर द्वारा सर्व साधारण तक शुद्ध और स्वच्छ शहद उपलब्ध कराया जाने लगा है।

http://www.daburhoney.com/

कर्ण

 

कर्ण – एक अभिशप्त पुत्र की व्यथापूर्ण आत्म कथा ( महाभारत की विडम्बना पूर्ण कहानी)

मंद शीतल वायु मेरे शरीर और आत्मा को ठंडक और सुख प्रदान कर रही है। साथ ही माँ
के हांथों का स्पर्श और अश्रु जल भी मेरी आत्मा को शीतल कर रही है। इस के लिए पूरी
जिंदगी अपने को जलाता रहा था।


माँ के इस स्पर्श के लिए ना जाने कब से तरस रहा था। मैंने उसे वचन दिया था, उसके पाँच
पुत्र जीवित रहेंगे। वचन पूरा करने का संतोष मुस्कान बन अधरों पर है। बचपन से आज तक
मुझे अपनी जीवन के सारे पल याद आ रहें हैं। अभी तक ना जाने कितने अनुतरित प्रश्न
मुझे मथते रहें हैं। कहतें हैं, मृत्यु के समय पूरे जीवन की घटनाएँ नेत्रों के सामने आ जाते
हैं। क्या मेरी मृत्यु मुझे मेरे पूर्ण जीवन का अवलोकन करवा रही है? अगर हाँ, तब मैं कहना
चाहूँगा- मृत्यु जीवन से ज्यादा सहृदया, सुखद और शांतीदायक होती है।


मैं अपने आप को बादल सा हलका और कष्टों से मुक्त पा रहा हूँ। चारो ओर हाहाकार और
रुदन है। रक्त धारा धरा के रंग को बदल रही है। यहाँ पर उपस्थित नर और नारी व्यथित
हैं। सभी के आश्रुपुर्ण नयन हैं। पति, पुत्र या पिता के लिए विलाप करनेवालों की आवाज़
वातावरण को व्यथित कर रहीं है। पर मैं असीम सुख के सागर में डूब उतरा रहा हूँ। अब ना
कोई दुख है ना कष्ट।


मैं, अंग नरेश, महायोद्धा , दानवीर, धर्मनिष्ठ, तेजोमय सूर्यपुत्र, ज्येष्ठ कुंती नन्दन, कौंतेय,
कर्ण या राधेय का शरीर कुरुक्षेत्र की धरा पर अवश, निर्जीव पड़ा है। तन पर अनेकों घाव हैं।साथ है, बेरहमी से खींच कर निकाले कवच-कुंडल का ताज़ा घाव और मुख से बहती रक्त धार।

मेरे रथ का चक्का मृतिका में अटका , जकड़ा है। मैंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र रख कर दोनों
हाथों से माटी में धसें रथ के चक्र को निकालने का असफल प्रयास कर रहा था। तभी छल से, युद्ध विधान के विपरीत, मुझ पर अर्जुन ने वार किया।


अभी भी ईश्वर के कठोरता की इति नहीं हुई। अभी भी मेरी परीक्षा शेष थी। जब मेरा अंत
निकट था। मैं अपने शारीरिक कष्टों और आसन्न मृत्यु को देख व्यथित था। तब, पिता
सूर्य और इंद्र मेरे कष्टों से द्रवित न हो , मेरे दानवीरता की सीमा जानने के बहस में लिप्त
हो गए।

मेरे दानवीरता को परखने के लिए भिक्षुक बन दोनों, मुझ से मेरे दाँतों में जड़ित तिल भर स्वर्ण की माँग कर बैठे। इंकार कैसे करता। मैंने ना बोलना नहीं सीखा है कभी। स्वर्ण टंकित दांत को कठोर पाषाण प्रहार से तोड़ भिक्षुक बने पिता सूर्य और इन्द्र को दे दिया था। अतः मुख भी आरक्त है। तप्त रक्त की धार मुख से बह कर मेरे संतप्त हृदय को ठंडक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।

*********************
आज मुझे अपने जन्म की कथा याद आ रही है। मैं अपने माँ के अंक में हूँ। एक सुंदर
स्वस्थ शिशु जो स्वर्ण अलंकारों से सज्जित है। ऐसे काम्य, सुंदर और स्वस्थ शिशु को देख
कर माँ की आँखों में प्रसन्नता क्यों नहीं है? क्यों वह अचरज भरी आँखों से मुझ को देख
रही है। अश्रु उसके ग्रीवा तक बह रहें है। फिर उसी माँ ने मुझे एक सुंदर मखमल युक्त पेटी
में गंगा में प्रवाहित कर दिया।

मेरे साथ यह सब क्या और क्यों हो रहा है? बाद में मुझे मालूम हुआ, मेरे माता कुंती को
दुर्वासा ऋषि ने मात्र किसी देव को स्मरण कर संतान प्राप्ति का वरदान दिया था। तत्काल
वरदान की सच्चाई जानने के प्रयास में वे सूर्य देव से मुझे मांग बैठीं। मैं, रवितनय कर्ण
तुरंत उनकी गोद में आ गया। पर माता कुंती में कुमारी माता हो, संतान को स्वीकार करने
की हिम्मत नहीं थी। फलतः माँ ने मुझे असहाय, गंगा की धार के हवाले कर दिया।

मैं अकेल सुंदर मखमल युक्त पेटी में गंगा की कलकल- छलछल करती पवित्र धार में बहता
जा रहा हूँ। जब मैंने आँखों को खोलने का प्रयास किया तब तेज़-तप्त पिता सूर्य की किरणें
नेत्रों में चुभने लगीं और मैं क्रंदन कर उठा। गगन में शान से दमकते हुए मेरे पिता ने सब
देखते हुए भी अनदेखा कर दिया।

पर निसंतान सूत अधिरथ ऐसा नहीं कर सके। उन्होने मुझे गंगा की धार में असहाय क्रंदन
करते सुना। तत्काल मुझे निकाल अपने साथ अपनी पत्नी के पास ले गया। एक माँ ने
अश्रुपूर्ण नयन से अर्क पुत्र को विदा कर दिया था। दूसरी, राधा माता ने परिचय जाने बगैर ,
खुशी से चमकते नेत्रों से और खुली बाहों से मुझे स्वीकार किया। उन्होने मेरा नाम रखा
वसूसेना । मेरे वास्तविक माता पिता कौन कहलाएंगे? राधा और धृतराष्ट्र के रथ को
चलानेवाले अधिरथ ही न?

जन्म से मेरे बदनटंकित स्वर्ण कवच –कुंडल और मेरे मुख पर पिता सूर्य का तेज़ देख मोहित
हो गए राधा और अधिरथ । निस्वार्थतापूर्वक, अपूर्व प्रेम के साथ पालक माता-पिता ने मेरा
पालन- पोषण किया। काश मैं उनका वास्तविक पुत्र होता। आज भी जब कोई मुझे राधेय
पुकारता है तब सबसे अधिक खुशी होती है। आजतक, मृत्युपर्यन्त, उन्हें ही मैं अपना माता-
पिता मान पुत्र धर्मों का निर्वाह करता आया हूँ।

मेरे बचपन में मेरे बाल्य सखा मुझे परिचय रहित मान चिढ़ाते। पास-पड़ोस के लोग अक्सर
मुझे देख उच्च स्वर में कानाफूसी करते, मुझे सुनाते और जलाते थे। मेरे दुखित हृदय कभी
किसी ने शीतल स्नेह से नहीं सहलाया।

मेरे बालपन में एक बार महारानी कुंती हमारे घर आई। मेरी माँ को अपनी सखी बताती थी।
विशेष रूप से मुझे से मिलीं। मुझे गोद में बैठा कर प्यार किया। पर उनकी नयन अश्रुपूर्ण
क्यों हैं? मेरा बाल मन समझ नहीं पाया। वे मेरे लिए वस्त्र और उपहार क्यों लाईं थीं? मैंने
द्वार के ओट से छुप कर सुना। वे मेरी भोली राधा माता से कह रहीं थी –“ राधा, तेरा यह
पोसपुत्र आवश्य किसी उच्च गृह का परित्यक्त संतान है। प्रेम से इसका पालन पोषण करना।

सब ने उनके महानता और सरलता की प्रशंसा की। राज परिवार की पुत्रवधू निष्कपट भाव से सूत पत्नी से मित्रता निभा रहीं हैं। एक अनाथ, अनाम बालक पर स्नेह वर्षा कर रहीं थीं।
तब किसी के समझ में नहीं आया कि परित्यक्त पुत्र के मोह और मन के अपराध बोध ने
उन्हें यहाँ आने के लिए बाध्य किया था।

बचपन से पांडव मुझे निकृष्ट सूत पुत्र मान कर अपमानित करते आए हैं। भीम हर वक्त मेरे
उपहास करता रहा है। अर्जुन मेरी श्रेष्ठता को जान कर भी अस्वीकार करता रहा है। आश्रम
के गुरुजन भी राजपुत्रों के सामने मुझे सूत पुत्र कह अपमानित करते हैं। पूरे संसार में धर्म
की रक्षा करने के लिए जाना जाने वाला युधिष्ठिर यह सब अन्याय देख कर हमेशा मौन रहे।

मैं सूत अधिरथ का पुत्र हूँ। पर रथ चलाने के बदले मेरी कामना होती अस्त्र-शस्त्र चलाने
की। द्रोणाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से इन्कार कर दिया। क्योंकि गुरु द्रोण मात्र राजपुत्रों और
क्षत्रियों को शिक्षा देते हैं। मैं दूर से, वृक्षों के झुरमुट से सौभाग्यशाली राजपुत्रों को देख उनके
भाग्य से ईष्या करता और अकेले में स्वयं अभ्यास करता। तब सोचा करता, सूत पुत्र के अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण की कामना ग़लत क्यों, भूल क्यों है?

द्रोणाचार्य के इन्कार के उपरान्त मैंने ने गुरु परशुराम के चरणों में आश्रय ढूँढ लिया। गुरु परशुराम मात्र ब्रहमनों को शिक्षा देते थे। मैंने अपना परिचय छुपा ज्ञान अर्जित किया। अपने
को सर्वोतम धनुर्धर बनाने के लिए रात-दिन मेहनत की और अपने उदेश्य में सफल हुआ।

एक दिन थके क्लांत गुरु जी को मैंने अपनी जंघा पर निंद्रा और विश्राम करने कहा। गुरु जी
गहरी नींद में सो गए। तब, अचानक एक कीट मेरे जंघा में काटने लगा। पीड़ा से मैं छटपटा
उठा। बड़ा दुष्ट कीट था। लगा जैसे मेरे जाँघों के अंदर छेद बना कर अंदर घुसता हीं जा रहा
है। बड़ी तेज़ पीड़ा होने लगी। कष्ट और अपने बहते रक्त की परवाह ना करते हुई मैं
निश्चल बैठा रहा, ताकि गुरु की निंद्रा में व्यवधान ना पड़े। जैसे पूरे जीवन मेरे अपनों ने ही
मुझे अपना नहीं माना, वैसे हीं उस दिन मेरे ही रक्त ने मुझे से दुश्मनी की।

जंघा से बहते, तप्त रक्त के स्पर्श से गुरु जी जाग गए। उन्हें मालूम था कि किसी ब्राह्मण
में इतनी सहनशीलता नहीं होती। बिना मेरी बात सुने मुझे श्राप दे डाला। फलतः मैं उनसे
शापित हुआ। उन्हों ने गुस्से से कहा, उनसे प्राप्त सारी शिक्षा और ब्रह्मास्त्र प्रयोग मैं तभी
भूल जाऊंगा, जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी। तब तक मुझे भी नहीं पता था कि वास्तव में मैं कौन हूँ? मुझे अधिरथ और उनकी पत्नी राधा का पुत्र वासुसेना या राधेय?

यह जान कर गुरु परशुराम का क्रोध ठंढा हुआ और तब उन्हों ने मुझे अपना धनुष “विजय’
दिया। साथ में दिया मेरे नाम को अमर होने का आशीर्वाद। पर श्राप तो अपनी जगह था ।
क्यों गुरु जी ने उनके प्रति मेरी श्रद्धा, सहनशीलता और निष्ठा नहीं देखी?

गुरु द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर में अपनी शिक्षा और शिष्यों की योग्यता प्रदर्शन करने के लिए
रंगभूमी प्रतियोगिता आयोजित किया। वहाँ अनेक राजे-महाराजे, सम्पूर्ण राज परिवार
आमंत्रित थे। सभी गणमान्य अतिथि और समस्त राज परिवार सामने ऊँचे मंच पर आसीन
थे। मैं भी उत्सुकतावश आयोजन में जा पहुंचा। सभी शिष्यगण अपनी योग्यता का प्रदर्शन
कर रहे थे। सबसे योग्य शिष्य अर्जुन अपनी धनुर्विध्या से सबको मोहित कर रहा था। गुरुवर
ने अर्जुन को सर्वोत्तम धनुर्धर बताया।

मुझे मालूम था कि मैं अर्जुन से श्रेष्ठ हूँ। अतः मैंने अर्जुन को ललकारा। पर यहाँ मेरे
योग्यता का सम्मान नहीं हुआ। कृपाचार्य ने मेरे राज्य और वंश पर प्रश्न चिन्ह लगाए। मैं
एक सूत-पालित पुत्र मात्र था। मात्र राजा या राज पुत्रों का ऐसे आयोजन में भाग लेने की
परंपरा रही है। मेरी आँखों में अश्रु कण छलक आए। पर वहाँ कोई नहीं था मेरे हृदय की
कातरता को समझनेवाला। सामने सिहांसनारूढ़ माता कुंती तो जानती थी मेरा गुप्त परिचय।

मेरे पिता, नभ स्वामी सूर्य तो पहचानते थे मुझे। पर वे चुपचाप चमकते रहे गगन में। मेरे
माता-पिता सब जान कर मौन रहे, मेरा दुख और अपमान देखते रहे। यह मेरे शर्म और अपमान की पराकाष्ठा थी। मेरे गुण सिर्फ इसलिए महत्वहीन थे, क्योंकि
मेरे पास अपना परिचय नहीं था। मेरा हृदय तड़प रहा था अपना परिचय जानने के लिए।

क्या कहाँ जन्म लेना है, यह किसी शिशु के वश की बात है? शायद ईश्वर से मेरा दर्द
सहा नहीं गया और मेरे सम्मान की रक्षा के लिए दुर्योधन को भेज दिया। उस दिन ज्येष्ठ
कौरव दुर्योधन ने मेरे सम्मान की रक्षा की। उन्हों ने तत्काल मुझे अंग देश का राजा,
अंगराज घोषित किया। अब मैं एक राजा की हैसियत से अर्जुन से युद्ध करने योग्य था।
बदले में ने दुर्योधन ने मात्र मेरी सच्ची मित्रता चाही।

सभी मुझे अंगराज बनने की बधाई दे रहे हैं। मेरे राजा बनने की खुशी में दुर्योधन ने एक
वृहद उत्सव आयोजित किया है। मेरे राज्य- अंगराज्य में खुशियाँ मनाई जा रहीं हैं।मेरा पूरा
राज्य दीपों से जगमगा रहा है। पर किसी को मेरे मनः स्थिती का ज्ञान नहीं है। इतने बड़े
सम्मान के बाद भी मेरे दिल का एक कोना खाली और अन्धकारमय है, जो मुझ से बारंबार
पूछता है – तू है कौन? कहाँ से आया है? तेरे माता-पिता कौन हैं?

मैं सूर्य आराध्य हूँ। अंगराज बन मैंने निर्णय किया। सूर्य उपासना के समय आए किसी भी
याचक को रिक्त हस्त कभी नहीं लौटने दूंगा। वे जो मांगेगे वही दान उन्हें मैं दूंगा। मैंने
संपूर्ण जीवन इसका पालन किया। आज मैं दानवीर कर्ण कहलाता हूँ। पर इसका लाभ बहुतों ने मुझे क्षति पहुंचा कर उठाया, चाहे वे मेरी माता कुंती, देवराज इंद्रा या स्वयं मेरे पिता
हिरणगर्भ कहलाने वाले सूर्य हों। सब समझते हुए भी मैं दानवीर बना रहा।

राजसिंहासनारूढ़ हो कर मैंने अपने कर्तव्य का पूर्णरूप निर्वाह किया। प्रजा का पूरा ध्यान
संतान की तरह रखा। एक दिन राज्याव्लोकन करने अपने अश्व पर निकला। मार्ग में एक
रोती हुई बालिका मिली। उसके पात्र से घृत मिट्टी में गिर गया था। मैंने अपनी ओर से उसे
घृत देना चाहा। पर बाल हठ था कि उसे वही घी चाहिए। उस असहाय कन्या के अनुरोध पर
मैंने जमीन पर गिरे घी को हाथों से निचोड़ कर मिट्टी मुक्त करना चाह। मिट्टी बलपूर्वक
हथेलियों से दबाने से भूमि देवी ने कुपित हो मुझे श्राप दे दिया। कहा, जब मैं किसी भीषण
युद्ध में संलग्न रहूँगा।तब वे मेरे रथ के चक्कों को वैसे ही बल से जकड़ लेंगी , जैसे आज
उन्हें मैंने अपनी मुष्टिका में दबाया है।

ऐसा और किसी के साथ तो उन्हों पहले किया हो ऐसा तो मैंने नहीं सुना है। कुम्हार भी तो
माटी को गुँधता, मसलता और आग में पकाता है। किसान धरती को रौंदता है और उसके
सीने पर बीज रोपता है। धरती तो माँ होती है, सहनशील होती है। फिर यह माँ भी मेरे साथ
इतना कठोर क्यों बन गई। एक बार भी बालिका को सहायता करने की मेरी अच्छी भावना
के बारे में क्यों नहीं सोंचा?

राजा द्रुपद ने सौंदर्यमती, अग्निजनित पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर आयोजित किया। यज्ञ की
अग्नि से जन्मी द्रौपदी अति रूपवान और विदुषी थी। अतः उनके स्वयंवर में जाने से मैं
अपने को रोक नहीं सका। मैं द्रौपदी का रूप देख कर उसपर मोहित हो गया। पर शर्त पूरी
करने के लिए स्वयंवर मंच पर नहीं गया। मैं जानता था कि मैं बड़ी सरलता से भारी धनुष
पर प्रत्यंचा चढ़ा कर मत्स्य नेत्रों का भेदन कर सकता हूँ। पर मैं अपनी परिचयरहित जीवन
की सच्चाई भी समझता था।

मन ही मन सौंदर्य की देवी द्रौपदी की स्तुति कर रहा था। मैं श्यामल सुंदरी द्रौपदी के नत
चेहरे को देखा रह गया। तभी द्रौपदी ने नज़रें उठाईं। हम दोनों के नज़रें मिलीं। वह मुझे
निहार रही थी। उनमें मेरे लिए प्रशंसा और प्रेम के भाव स्पष्ट थे। किसी भी वीर में जब
स्वयंवर के शर्त को जीतने की क्षमता नहीं दिखी। तब पुष्प और स्वर्ण गहनों की सज्जा से
चमकता द्रौपदी का नत चेहरा उदास और नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए। मेरा हृदय अपना दुख भूल
द्रौपदी के दुख से व्यथित हो गया। अगर आज स्वयंवर की शर्त पूरी नहीं हुई तो द्रौपदी को
आजीवन कौमार्य व्रत लेना होगा।

आवेश में आ कर, स्वयंवर क्षेत्र की ओर कदम बढ़ाए। आधी शर्त मैंने धनुष को मोड़ और
उस पर प्रत्यञ्चा चढ़ा पूरी भी कर ली। तभी कृष्ण ने नयनों के इशारे को देख धृष्ठधुम्म्न,
द्रौपदी के जुड़वाँ भ्राता ने मेरी पहचान पर प्रश्न उठा, मुझे रोक दिया। कहा, मैं ब्राह्मण या
राजपुत्र नहीं हूँ। पर मैं स्वयंवर मंडप में खड़े होने का भूल कर बैठा था। फलतः द्रौपदी के
स्वयंवर में विद्रुप भरे अपमानजनक प्रश्नों की श्लाका से मुझे दागा गया।

सभी उपस्थित राजा, महाराजा मेरी ओर व्यंग बाणों की वर्षा करने लगे। जो मौन थे, उनके
नेत्रों की व्यंग अग्नि मुझे झुलसा रही थी। गगन में प्रकाश बिखरते मेरे पिता ने मेरा
अपमान देख, अपना मुख बादलों की ओट में कर लिया। सभागृह में बैठे सर्वज्ञ और युग
द्रष्टा कृष्ण ने मौन रह मेरे साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया। स्वयं मुझे मुक आमंत्रण  देनेवालीद्रौपदी भी मौन रही। मेरा हृदय विदीर्ण हो गया। अपमानित, अनाथ, राधेय झुके नेत्रों से वापस अपने आसान पर आसीन हो गया।

दुर्योधन मेरे साथ बैठ द्यूतक्रीड़ा के आयोजन की चर्चा कर रहा है। मुझे जुआ जैसा निकृष्ट
क्रीडा या लाक्षा गृह जैसे गलत और कपटपूर्ण कार्यों का आयोजन पसंद नहीं है। अतः मैंने
दुर्योधन को बहुत रोका और समझाया। मुझे मामा शकुनि के गलत परामर्श भी नापसंद हैं।
परंतु जीत शकुनि की हुई। वीरता और युद्ध से पाँडवों का सामना करने के बदले छल और
कपट का सहारा लिया गया।

पर, द्यूतक्रीड़ा के दौरान पाँडवों को पराजित होते देख कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँच रही थी।
अब लग रहा था दुर्योधन ने उचित किया, पाँडवों को इस तरह अपमानित कर। बचपन से
ये भी तो ऐसे ही मुझे अपमानित करते आए हैं। आज उस द्रौपदी को भी अपमानित होना
पड़ेगा, जो मेरे अपमान का कारण बनी थीं। मैंने द्रौपदी को बहुपति, नगरवधु कह चीरहरण
के लिए कौरवों को आक्रोशित कर भड़काया। यह द्रौपदी को ना पाने और मेरे अंदर विश्व के प्रति भरे आक्रोश ने मुझ से करवाया था। पर सच बताऊँ? द्रौपदी का अपमान मेरे हृदय को कचोटता है। आज भी मैं अपनी उस भूल के लिए शर्मिंदा हूँ।

वनवास के लिए प्रस्थान करते हुए द्रौपदी के सारे आभूषण और मूल्यवान वस्त्र दुर्योधन ने
उतरवा लिए हैं, यह ज्ञात होते हीं मैंने सम्मानपूर्वक उन्हें कुछ आभूषण भिजवाए। पर उस
सौंदर्यमयी स्वाभिमानी नारी ने उन्हें ठुकरा दिया।

वनवास पश्चात, पाँडवों के लौटने पर कृष्ण ने दुर्योधन से उनका राज्य लौटाने का अनुरोध ले कर आए। दुर्योधन के इंकार के पश्चात कृष्ण मेरे पास पहुँचें। एकांत मंत्रणा कक्ष में कृष्ण ने ऐसे रहस्य का अनावरण किया, जिसे जानने के लिए मैं न जाने कब से तड़प रहा था।

प्रथम बार मुझे अपने परिवार और माता-पिता का परिचय ज्ञात हुआ। सब मेरे इतने करीब
हैं? फिर भी इतने दूर? मैं राजपुत्र सूर्य पुत्र हूँ? पर कभी किसी ने क्यों नहीं बताया? मेरे
दुख और अपमान को बढ़ाते क्यों रहे? आज कान्हा युद्धगत नीतियों के कारण मेरा लाभ
उठाने के लिए यह बता रहे हैं- मैं कुंती पुत्र हूँ। मेरे पिता सूर्य हैं। पाँच पांडव मेरे भाई हैं।
अतः अब मुझे पाँडवों का, सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए।

क्या मुझे दुर्योधन की मित्रता भूल नटवर, मनोहर कान्हा की बातें मान लेनी चाहिए? पर मैं
आज भी दुर्योधन के ऋण से उऋणी नहीं हुआ हूँ। मेरे पीड़ा और अपमान के क्षणों के साक्षी कृष्ण पहले कहाँ थे? जब सब मेरा अपमान करते थे और मुझे लगता था सारी दुनिया को
जला कर राख़ कर दूँ। तब उन्होंने धर्म और सत्य की चिंता क्यों नहीं की। आज मैं
स्वार्थवश दुर्योधन को छोड़ दूँ, यह मुझसे नहीं होगा।

अब कौरव-पाँडवों के मध्य युद्ध हो कर रहेगा, यह स्पष्ट हो गया है। ऐसे में युद्ध पूर्व,
संध्या काल में माता कुंती मुझ से मिलने आई और मुझे कौंतेय कह कर पुकारा। अपने जिस
परिचय को जानने के लिए मैं तरसा, मेरी माँ कुंती ने मुझे महाभारत युद्ध के आरंभ में
बताया। बदले में अपने पुत्रों के प्राण रक्षा की कामना की। हाँ, उन्हों मुझे लालच जरूर दिया
यदि मैं कौरवों को छोड़ पाँडवों के पास आ जाऊँ। तब राज्य , धन और द्रौपदी सब मेरे
हिस्से में होगें। पर क्या वे सब मुझे हृदय से स्वीकार कर सकेंगे? आज अचानक वे सब
मुझे बड़ा भ्राता मान कर सम्मान कर सकेंगे ? इसके आलाव मेरी निष्ठा का भी सवाल है।
मैं मित्र दुर्योधन को धोखा नहीं दे सकता।

राज्यसिंहासन और द्रौपदी पाने का लोभ दे कर माता ने क्यों कुंती पुत्र होने का परिचय
दिया। अगर शर्तरहित परिचय दिया होता, मैं अविलंब उसके चरणों में झुक जाता। कितनी
बार इस माँ ने अपने नज़रों के सामने मुझे दुखित, व्यथित और अपमानित होते देखा। तब
क्यों उसका हृदय मेरे लिए क्रंदन नहीं किया? आज मैं कौंतेय नहीं राधेय हूँ।

आज भी वह मेरी नहीं वरन पांडवों की चिंता कर रही है। बड़ी भोली हैं। मैं पाँडवों का अग्रज
हूँ, यह जान कर मैं उनके प्राण कभी नहीं ले सकता हूँ, इतना तक नहीं समझती हैं। अतः
मैंने माता को वचन दिया। उसके पाँच पुत्र आवश्य जीवित रहेंगे। माँ ने मेरी दानशीलता का
उपयोग पंच पुत्रों के जीवन रक्षा के लिए काम में लाया। जबकि सब जानते हैं, कि कृष्ण के
रहते पांचों पांडव का बाल भी बाँका नहीं हो सकता। मेरे जीवन की रक्षा का विचार किसी के
मन में नहीं आया।

महाभारत की पूर्वसंध्या के समय मुझसे दान माँगने आए दीन-हीन भिक्षुक की कामना ने
मुझे चकित कर दिया। मेरे शरीर के साथ जड़ित मेरी सुरक्षा कवच, स्वर्ण कवच और कुंडल
मांगने वाल यह ब्राह्मण कौन है? यह कवच –कुंडल इसके किस काम का है?

वास्तव में, अर्जुन के पिता इंद्र ने मेरे दानवीरता का उपयोग अपने पुत्र के प्राण रक्षा के लिए
किया था। मुझे अजेय बनाने वाले कवच-कुंडल, छद्म ब्राह्मण रूप बना मांग लिया। यह था
पिता-पुत्र प्रेम। कितना भाग्यशाली है अर्जुन। इंद्रा ने छल किया ताकि उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा हो सके। बदले में अपना अमोघ अस्त्र “शक्ति” मुझे एक बार प्रयोग करने की अनुमति दी।

मेरे पिता आसमान में सात घोड़ों के रथ पर सवार रहे। सब पर अपना प्रकाश समान
रूप से डालते रहे। पर मेरे ऊपर उनकी नज़र नहीं पड़ी। मेरी माता हीं नहीं मेरे पितामह भीष्म भी मुझे समझ नहीं पाये। महाभारत युद्ध पूर्ण गति से आरंभ हो चुका था। सेनापति, पितामह भीष्म ने मुझे युद्ध में भाग नहीं लेने दिया। उन्हे भय था, मैं अचानक पाँडवों का साथ देने लगूँगा, कौरवों को धोखा दे दूंगा। दसवें दिन उनके शर शैया पर जाने के बाद ग्यारहवें दिवस से मुझे कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में जाने की आज्ञा मिली।

चौदहवें दिन युद्ध में ना चाहते हुए भारी हृदय से भीम पुत्र घटोत्कच का मुझे संहार करना
पड़ा। युद्ध विभीषिका के मध्य, सत्रहवें दिन मेरे सामने रथ पर मेरा अनुज अर्जुन था।
पांडवों को मेरा परिचय ज्ञात नहीं था। पर मैं तो सब जानता था। छोटे भाई को मैं शत्रु रूप
नहीं देख रहा था। आज अपना परिचय जानना मेरे लिए ज्यादा पीड़ादायक हो गया है। मेरी
आँखों में अनुज के लिए छलक़ते प्रेम को कोई नहीं पढ़ सका। कृष्ण, अर्जुन को गीता का
पाठ पढ़ाते रहे।

मैं अपने दैवीय और अमोघ अस्त्र-शस्त्र से ऐसे प्रहार करता रहा कि देखनेवाले तो इसे युद्ध
माने पर मेरे अनुज अर्जुन का अहित ना हो। मुझे ज्ञात था कि इस निर्णायक युद्ध का अंत
मेरी मृत्यु से होगा।

जिसकी माँ ही उसके मृत्यु की कामना करती हो और पिता नेत्र फेर ले। उसे वैसे भी जीवित
रहने का क्या लाभ है? माँ ने मेरी सच्चाई पांडवों को भी बताई होती, तब बात अलग होती।
मैं अपने मृत्यु के इंतज़ार में युद्ध का खेल खेलता रहा और अपने अंत का इंतज़ार करता
रहा।

मैं छोटे भ्राता के युद्ध कौशल से अभिभूत उसकी प्रशंसा कर उठा। तभी मेरे रथ का चक्र
मिट्टी में धंस गया। मैं रथ से नीचे उतार गया। सारे अस्त्र-शस्त्र रख मृतिका में फंसे रथ के
चक्के को पूर्ण शक्ति के साथ निकालने लगा।

मुझे पूर्ण विश्वास था कि अर्जुन निहत्थे शत्रु पर वार नहीं करेगा। पर हुआ ठीक विपरीत। मैं
हतप्रभ रह गया। नटवर, रणछोड़, कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने मुझ निहत्थे पर वार कर
दिया। अस्त्र-शस्त्र विहीन अग्रज के साथ अर्जुन ने भी छल कर दिया। शायद अच्छा हुआ।
वरना ना जाने कब तक, मुझे छद्म युद्ध जारी रखना पड़ता। आघात ने मेरे असहाय शरीर को भूमि पर धाराशायी कर दिया। अर्धखुले, अश्रुपूर्ण नयनों से मैंने अनुज भ्राता को प्रेमपूर्ण
नयनों से देखा। नेत्रों में भरे आए अश्रुबिंदु से अनुज की छाया धुँधली होने लगी।मेरे नेत्र धीरे-
धीरे बंद होने लगे। पर, मेरे नील पड़ते अधरों पर तृप्तीपूर्ण विजय मुस्कान क्रीडा कर रही
थी।

आज युद्ध क्षेत्र में एक अद्भुत दृश्य ने मुझे चकित कर दिया है। मुझे संपूर्ण जीवन
अभिशप्त और परिचय विहीन कह कर अपमानित करने वाले पांचों पांडव मेरे लिए रुदन कर
रहें है। मेरी माता श्री मेरे अवश और निर्जीव शरीर पर मस्तक टिकाये विलाप कर रही है।
माता कुंती से अधिक पांडव दुखित हैं। मेरा परिचय गुप्त रखने के लिए क्रोधित हो रहें है।

धर्मराज युधिष्ठिर करुण नेत्रों से माता कुंती को देखते रह गए। जैसे उनके व्यथित नयन कह
रहे हों -” माता तो कुमाता नहीं होती कभी “। और फिर वे कह उठे, “माता, आज तुम्हारी
इस भूल का मूल्य सम्पूर्ण स्त्री जाति को चुकाना पड़ेगा। मैं तुम्हें और समस्त नारी जाति
को शापित करता हूँ, कि उनमें कभी भी किसी बात को गुप्त रखने की क्षमता न रहे।

जीवित कर्ण को वितृष्णा की दृष्टि से देखनेवाले पांडव उस के शव को पाने और अंतिम
संस्कार करने के लिए व्याकुल दिख रहे है। आज कौरव और पांडव मेरे निर्जीव काया को
पाने के लिए आपस में झगड़ रहें हैं। कौन मेरा अंतिम संस्कार करेगा? कैसी विडम्बना है।
काश, इस प्रेम का थोड़ा अंश भी जीवन काल में मुझे प्राप्त होता तो मेरी तप्त आत्मा शीतल
हो जाती। पर सच कहूँ? हार कर भी मैं जीत गया हूँ।

 

======

 

mahabharatha1