मुरूगन मंदिर के अद्भुत पुजारी जिसे मैं भूल नहीं पाई ( यात्रा वृतांत और प्रेरक कहानी )

यह घटना लगभग 3-4 वर्ष पुरानी है। मैं सपरिवार दक्षिण की यात्रा पर गई थी। वापसी में मैं मदुरै पहुँची। वहाँ के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर के सौंदर्य से हम सभी अभिभूत थे। इसलिए मै वहाँ के दूसरे महत्वपूर्ण मुरूगन (कार्तिकेय ) मंदिर को देखने का लोभ रोक नहीं सकी। मीनाक्षी मंदिर देखने में काफी समय लग गया था। फिर भी संध्या में मै सपरिवार मुरूगन मंदिर पहुँची। पता चला, मंदिर के बंद होने का समय हो रहा है। मंदिर दर्शन के लिए लंबी लाईन लगी थी। लग रहा था, इस भीड़ में मंदिर में प्रवेश असंभव है। हमारे पास समय कम था।

कुछ राह नहीं सूझ रहा था। अगले दिन सुबह-सुबह वापस लौटने का टिकट कटा था। अतः दूसरे दिन भी दर्शन संभव नहीं था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। थोड़े सोच-विचार के बाद हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट लेने का निर्णय लिया। दक्षिण के मंदिरों में विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट द्वारा तत्काल दर्शन की बड़ी अच्छी व्यवस्था है। हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट खिड़की खोजने का प्रयास किया। पर असफल रहे। लोगों से पूछना चाहा। पर भाषा की समस्या सामने आ गई। हिंदी और अँग्रेजी में लोगों से मदद लेने का असफल प्रयास किया। कोई लाभ नहीं हुआ।
मंदिर के वास्तुकला से मैं बहुत प्रभावित थी। भव्य, नक़्क़ाशीदार दीवारें, विशाल मंदिर, चट्टानों की ऊँची -ऊँची सीढ़ियाँ और खंभे सब अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। यह मंदिर मदुरै से आठ किलोमीटर दूर है। इसे थिरुप्परमकुनरम मुरुगन मंदिर भी कहते हैं। भगवान मुरूगन के साथ-साथ भगवान शिव , भगवान विष्णु , भगवान विनायक और देवी दुर्गा भी यहाँ स्थापित हैं। पौराणिक कथा या किवदंती है कि इस स्थान पर भगवान मुरुगा ने देवराज इंद्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था।

हमलोग निराश होने लगे। लगा, बिना दर्शन के वापस लौटना होगा। तभी थोड़े उम्रदराज, पुजारी जैसे लगाने वाले एक व्यक्ति हमारे पास आए। वे अपनी भाषा में कुछ कह रहे थे। पर हमें कुछ समझ नहीं आया। हमने हिंदी और अँग्रेजी में उनसे विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट पाने का स्थान पूछा। पर वे हमारी बात नहीं समझ सके। किसी तरह हम इशारे से यह समझाने में सफल हुए कि हम मंदिर में दर्शन करना चाहते है। उन्होने हम सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया और तत्काल अपने साथ मंदिर के अंदर ले गए। सभी ने उन्हे और हम सभी को तुरंत अंदर जाने का मार्ग दिया। मंदिर के गर्भगृह के सभी पुजारियों ने उन्हे बड़े सम्मान से प्रणाम किया और हमें दर्शन कराया। वे शायद वहाँ के सम्मानीय और महत्वपूर्ण पुजारी थे।
गर्भगृह से बाहर आ कर उन्होने एक जगह बैठने का इशारा किया। थोड़े देर में वे फूल, माला और प्रसाद के साथ लौटे। हमें बड़े प्यार से टीका लगाया और प्रसाद दिया। हम हैरान थे। एक प्रतिष्ठित और उच्च पदासीन पुजारी हम अनजान लोगों की इतनी सहायता क्यों कर रहे हैं? हमे लगा अब पुजारी जी अच्छी दक्षिणा की मांग करेंगे।
अतः मेरे पति अधर ने उन्हे कुछ रुपये देना चाहा। पर उन्होने लेने से इंकार कर दिया। हमारे बार-बार अनुरोध पर सामान्य सी धन राशि दक्षिणा स्वरूप ली।
इस घटना ने हमे पुजारी और ईश्वर की लीला के सामने नत मस्तक कर दिया। हम सभी एक अजनबी शहर के अजनबी पुजारी के सौजन्य की यादों के साथ वापस लौटे।

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