कोलकाता की यादें ३ – कोहिनूर चाय ( यात्रा अनुभव )

मुझे मालूम हुआ न्यू मार्केट में चाय पत्ती की बड़ी अच्छी दुकान “कोहिनूर” है। बंगाल की दार्जिलिंग चाय बड़ी मशहूर है और मेरी पसंदीदा भी। दुकान ढूँढते हुए हम हौग मार्केट के पीछे की सड़क पर पहुँचें। वहाँ चाय पत्ती की एक दुकान तो दिखी। पर उसका नाम कहीं लिखा नज़र नहीं आया। पूछने पर मालूम हुआ कि इस दुकान का नाम कोहिनूर है।
चाय की प्याली को होठों के लगाने के पहले हम शायद हीं उसके इतिहास या नाम के बारे में सोंचते है। पर सच्चाई यह है कि इनकी भी अपनी कहानी होती है और इनका भी अपना एक नाम होता है। काली, सफ़ेद , हरी और ऊलोंग (चीन की) चाय पत्तियाँ अलग-अलग होतीं हैं।
चाय पत्तियों के बारे में दिलचस्प बात यह है कि चाय पत्तियाँ जिस स्थान या स्टेट में उपजाई जाती हैं। उस नाम से ही जानी जाती हैं। जैसे तीस्ता घाटी क्षेत्र की पत्तियाँ तीस्ता चाय पत्ती और मकईबारी स्टेट की पत्ती मकाईबारी चाय पत्ती के नाम से बाज़ार में मिलती है। दार्जिलिंग में ऐसे ही ढेरो टी स्टेट है। अलग-अलग जगहों कि पत्तियों के रंग, स्वाद और खुशबू में अंतर होता है। स्वाद और खुशबू के आधार पर चाय पत्तियों का मूल्य तय होता है।
कोहिनूर दुकान से हमने थोड़ा गोल दाने वाली पत्तियाँ ली। ये चाय को गहरा रंग देती है। साथ में थोड़ा लीफ़ लिया। ऐसी पत्ती हल्का रंग देती है पर इनकी खुशबू बड़ी अच्छी होती है। वापस लौटने पर इन से चाय बना कर पीने पर दिल खुश हो गया। साथ ही आफसोस हुआ कि मैंने पत्तियाँ ज्यादा क्यों नहीं लीं। कोहिनूर दुकान वास्तव में अच्छी दुकान है। ।

कोलकाता की यादें १ – वह रिक्शावाला ( यात्रा अनुभव )


मैं और मेरे पति अधर कोलकाता के न्यू मार्केट में घूम रहे थे। बाज़ार में भीड़ और चहल-पहल थी। बगल में था होग मार्केट। कपड़े, जूते, चप्पल, बैग और ढेरो समान से बाज़ार भरा था। यह बाज़ार ऐसा है, जहाँ पैदल घुमने का अपना मज़ा है। पर काफी चलने के बाद थकान हो गई। तब मेरे पति अधर नें रिक्शा लेने का सुझाव दिया और एक रिक्शेवाले से बातें करने लगे।
कोलकाता के ऊँचे और बड़े-बड़े चक्कों वाले रिक्शे मुझे देखने में अच्छे लगते हैं। पर किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचना मुझे अच्छा नहीं लगता है। अतः मैंने रिक्शे पर बैठने से मना कर दिया। रिक्शेवाला मेरी इन्कार सुन कर मायूस हो गया। उसे लगा कि मैं पैसे की मोल-मोलाई कर रही हूँ। उसने मुझसे कहा- “ दीदी, पैसे कुछ कम दे देना। मैंने बताया कि पैसे की बात नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचंना मुझे अच्छा नहीं लगता । तब रिक्शे वाले ने ऐसी बात कही, जो मेरे दिल को छु गई और मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई।
उम्रदराज, दुबला-पतला, सफ़ेद बालोंवाले रिक्शा चालक ने कहा- “ यह तो मेरा रोज़ का काम है। हमेशा से मैंने यही काम किया है। अब मैं दूसरा कोई काम कर भी नहीं सकता। यही मेरी कमाई का साधन है। आप बैठेंगी तो मेरी कुछ कमाई हो जाएगी। वरना कोई दूसरी सवारी का इंतज़ार करना होगा। पैसे तो मुझे कमाने होंगे।
पता नहीं कब हमारे देश से गरीबी कम होगी? लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर कब प्राप्त होगें?