जीवन के बिखरे पन्नों को समेटते – समेटते,
लगा जैसे युग बीत गये………
पर यादों के समुन्द्र से बाहर आ कर देखा,
बस कुछ हीं पल गुजरें थे।
जीवन के बिखरे पन्नों को समेटते – समेटते,
लगा जैसे युग बीत गये………
पर यादों के समुन्द्र से बाहर आ कर देखा,
बस कुछ हीं पल गुजरें थे।
मुम्बई की रिमझिम वर्षा की फुहारें
गंदलाये समुन्द्र की उठती पटकाती लहरे,
आसमान से नीचे झुक आये धुंध बने बादल ,
सीकते भुट्टो की सोंधी खुशबू
देख फुहारों में भीगने का दिल हो आया. …..
बाद में कहीँ नज़र आया
टपकती झोपड़ियों में भीगते ठिठुरते बच्चे ,
यह मेह किसी के लिये मजा और किसी की सजा है.
बाहर का बरसात, अंदर आँखो के रस्ते बरसने लगा.
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