Tag: रास्ते
गिनती बन कर रह गए!
श्रम के सैनिक निकल पड़े पैदल, बिना भय के बस एक आस के सहारे – घर पहुँचने के सपने के साथ. ना भोजन, ना पानी, सर पर चिलचिलाती धूप और रात में खुला आसमान और नभ से निहारता चाँद. पर उन अनाम मज़दूरों का क्या जो किसी दुर्घटना के शिकार हो गए. ट्रेन की पटरी पर, रास्ते की गाड़ियों के नीचे? या थकान ने जिनकी साँसें छीन लीं. जो कभी घर नहीं पहुँचें. बस समाचारों में गिनती बन कर रह गए.
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ख्वाहिशें थम जाएं
रास्ते कहां खत्म होते हैं ज़िन्दगी के सफ़र में…
मंज़िल तो वही है जहां ख्वाहिशें थम जाएं…!!
Unknown

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