क्यों चुप है चाँद ?

क्यों आज चुप है चाँद ?

ना जाने कितनी बातों का गवाह

कितने रातों का राज़दार

फ़लक से पल पल का हिसाब रखता,

कभी मुँडेर पर ,

कभी किसी  शाख़-ए-गुल को चूमता,

गुलमोहर पर बिखरा कर अपनी चाँदनी अक्सर

थका हुआ मेरी बाहों में सो जाता था.

किस दर्द से बेसबब

चुप है चाँद ?

जिंदगी के रंग – 98

चाँद चुराया

अरमानों को पूरा करने के लिए .

कई रातों की नींद अौर

साज़िश ख़्वाबों की

पूरी  नहीं होने दीं।

ज़ुबा बया करती रही अपने ज़ज़्बात।

पर……….

तेज़ बयार चली और अरमानों  का चाँद

छुप गया बादलों के आग़ोश में.

आवाज़ बिखर गई

टूटे काँच की किरचियों की तरह,

साथ हीं बिखर गए अरमानों के टुटे टुकड़े।