कोलकाता की यादें १ – वह रिक्शावाला ( यात्रा अनुभव )


मैं और मेरे पति अधर कोलकाता के न्यू मार्केट में घूम रहे थे। बाज़ार में भीड़ और चहल-पहल थी। बगल में था होग मार्केट। कपड़े, जूते, चप्पल, बैग और ढेरो समान से बाज़ार भरा था। यह बाज़ार ऐसा है, जहाँ पैदल घुमने का अपना मज़ा है। पर काफी चलने के बाद थकान हो गई। तब मेरे पति अधर नें रिक्शा लेने का सुझाव दिया और एक रिक्शेवाले से बातें करने लगे।
कोलकाता के ऊँचे और बड़े-बड़े चक्कों वाले रिक्शे मुझे देखने में अच्छे लगते हैं। पर किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचना मुझे अच्छा नहीं लगता है। अतः मैंने रिक्शे पर बैठने से मना कर दिया। रिक्शेवाला मेरी इन्कार सुन कर मायूस हो गया। उसे लगा कि मैं पैसे की मोल-मोलाई कर रही हूँ। उसने मुझसे कहा- “ दीदी, पैसे कुछ कम दे देना। मैंने बताया कि पैसे की बात नहीं है। किसी व्यक्ति द्वारा पैदल रिक्शा खीचंना मुझे अच्छा नहीं लगता । तब रिक्शे वाले ने ऐसी बात कही, जो मेरे दिल को छु गई और मैं चुपचाप रिक्शे पर बैठ गई।
उम्रदराज, दुबला-पतला, सफ़ेद बालोंवाले रिक्शा चालक ने कहा- “ यह तो मेरा रोज़ का काम है। हमेशा से मैंने यही काम किया है। अब मैं दूसरा कोई काम कर भी नहीं सकता। यही मेरी कमाई का साधन है। आप बैठेंगी तो मेरी कुछ कमाई हो जाएगी। वरना कोई दूसरी सवारी का इंतज़ार करना होगा। पैसे तो मुझे कमाने होंगे।
पता नहीं कब हमारे देश से गरीबी कम होगी? लोगों को रोजगार के अच्छे अवसर कब प्राप्त होगें?

गुप्त कामाख्या – दीर्घेस्वरी मंदिर गौहाटी –( यात्रा संस्मरण और वहाँ की पौराणिक कहानियाँ )

 

दिनांक – 10.2.2015, बुधवार। समय दोपहर – 12:30
यह मंदिर भारत सरकार द्वारा सुरक्षित प्राचीन स्मारक है। यहाँ पत्थरों पर अनेक रचनाएँ / आकृतियाँ प्राचीन समय की हैं। यहाँ के पुजारी के अनुसार यह गुप्त कामाख्या के रूप में भी जाना जाता है। यह गौहाटी शहर के उत्तर में, ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित है। सड़क के किनारे कुछ पूजा सामग्री की दुकाने हैं। वहीं से मंदिर की सीढ़ियाँ शुरू होती है। थोड़ा ऊपर जाने पर बाईं ओर चट्टान पर गणेश जी विशाल प्रतिमा बनी है। जो सिंदूर आरक्त है। बगल में चट्टान पर विशाल पीपल वृक्ष है। मंदिर में आने-जाने के लिए अन्य सीढ़ियां भी बनी है। मंदिर तक की सीढ़ियों को चढ़ने के दौरान अनेकों प्रतिमाएँ चट्टानों पर बनी दिखती हैं। मंदिर परिसर में माँ के पद चिन्ह बने है।जहां पुष्प और सिंदूर चढ़ाये जाते है।
इस मंदिर का निर्माण राजा स्वर्गदेव शिव सिंह ने 1714 से 1744 में करवाया था। इस वंश के बाद के राजाओं ने भी इसकी देखभाल की। तत्कालीन राजाओं ने यह जानकारी एक पत्थर पर अंकित करवाया था। जो आज भी मंदिर के पीछे के द्वार पर उपलब्ध है। यह मंदिर पथरीली पहाड़ी के ऊपर है। यहाँ दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े धूम-धाम से होता है तथा भैंसे की बलि दी जाती है।
मंदिर के अंदर जाने के लिया सीढ़ियों से अंदर उतरना पड़ता है। ये सीढ़ियाँ एक छोटी अंधकरमय गुफा में ले जातीं हैं। यह प्रकृतिक रूप से बनी गुफा है। यह मंदिर का गर्भगृह है। जहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते है। उसकी रोशनी में मंदिर के एक कोने में बैठे पुजारी पूजा-अर्चना करवाते हैं। पुजारी जी से पूछने पर उन्होने वहाँ से जुड़ी दिलचस्प कहानी सुनाई।
किवदंतियाँ –
1) ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर मार्कन्डेय मुनि का आश्रम हुआ करता था। मंदिर के गर्भगृह में उन्होने माँ दुर्गा की आराधना की। माँ ने इस गर्भगृह में उन्हे दर्शन दिया था। यहीं पर उन्होने मार्कन्डेय पुराण की रचना की थी।
2) इस मंदिर को भी शक्तिपीठ कहा गया है। इस स्थान को गुप्त कामाख्या भी कहते है। ऐसा कहा जाता है कि कामाख्या माँ के दर्शन के बाद यहाँ दर्शन लाभदायक होता है।गौहाटी में कामाख्या मंदिर के बाद दीर्घेस्वरी मंदिर को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। एक मान्यता यह भी है कि यहाँ भी सती के कुछ अंग गिरे थे ।

एक अनुठा होटल- फ़्लोटेल (यात्रा वृतांत )

कोलकाता के प्रवास के दौरान एक ऐसे होटल में रुकने का अवसर मिला जो हुगली नदी पर है। यह होटल दावा करता है, कि यह भारत भर में नदी पर बना अकेला होटल है। साथ ही यह पर्यावरण सहयोगी होटल है । इस होटल से नया और पुराना दोनों हावड़ा पुल नज़र आता है। दूर, नदी के दूसरे किनारे पर हावड़ा रेलवे-स्टेशन नज़र आता है। नदी के दूसरे तट पर मंदिर और अनेकों जेट्टी / घाट नज़र आते हैं।
इसकी एक और बात अनूठी है। इस होटल के एक ओर रेल लाईन दूसरी ओर हुगली नदी है। यह होटल भी एक घाट / जेट्टी पर है तथा एक पुल से होटल जुटा है। ज़्वार- भाटे के साथ-साथ यह होटल ऊपर-नीचे होता है।
यह होटल फ्लोटेल स्ट्रेंड रोड पर है। जो कोलकाता का एक ऐतिहासिक स्थान है। इसके पास ही बाबू घाट है। जिससे लगातार जल परिवहन के जहाज चलते रहते हैं। इसके पास इडेन गार्डेन स्टेडियम, स्टेट बैंक का आफिस, गवर्नर हाऊस, कोलकाता उच्च न्यायालय, आकाशवाणी भवन, अँग्रेज़ो के समय का जाना-माना 1887 स्थापित तरणताल है। हावड़ा रेल स्टेशन भी करीब है।
यह वास्तव में अनोखा होटल है। इसमें रहने का अपना मज़ा है। सबसे ख़ास बात है हुगली के पल-पल बदलते रंग को इतने निकट से देखने का अवसर मिलता है। यह होटल हुगली नदी के जल में जहाज के रूप तैरता रहता है। इसलिए दिन और रात हर समय नदी को करीब से देखा जा सकता है।

इस होटल में रहने का एक अलग  खूबसूरत एहसास  है। मैं अपने कोलकाता के इस खुशनुमा याद को कभी भुला नहीं पाऊँगी।

मुरूगन मंदिर के अद्भुत पुजारी जिसे मैं भूल नहीं पाई ( यात्रा वृतांत और प्रेरक कहानी )

यह घटना लगभग 3-4 वर्ष पुरानी है। मैं सपरिवार दक्षिण की यात्रा पर गई थी। वापसी में मैं मदुरै पहुँची। वहाँ के विश्व प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर के सौंदर्य से हम सभी अभिभूत थे। इसलिए मै वहाँ के दूसरे महत्वपूर्ण मुरूगन (कार्तिकेय ) मंदिर को देखने का लोभ रोक नहीं सकी। मीनाक्षी मंदिर देखने में काफी समय लग गया था। फिर भी संध्या में मै सपरिवार मुरूगन मंदिर पहुँची। पता चला, मंदिर के बंद होने का समय हो रहा है। मंदिर दर्शन के लिए लंबी लाईन लगी थी। लग रहा था, इस भीड़ में मंदिर में प्रवेश असंभव है। हमारे पास समय कम था।

कुछ राह नहीं सूझ रहा था। अगले दिन सुबह-सुबह वापस लौटने का टिकट कटा था। अतः दूसरे दिन भी दर्शन संभव नहीं था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। थोड़े सोच-विचार के बाद हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट लेने का निर्णय लिया। दक्षिण के मंदिरों में विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट द्वारा तत्काल दर्शन की बड़ी अच्छी व्यवस्था है। हमने विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट खिड़की खोजने का प्रयास किया। पर असफल रहे। लोगों से पूछना चाहा। पर भाषा की समस्या सामने आ गई। हिंदी और अँग्रेजी में लोगों से मदद लेने का असफल प्रयास किया। कोई लाभ नहीं हुआ।
मंदिर के वास्तुकला से मैं बहुत प्रभावित थी। भव्य, नक़्क़ाशीदार दीवारें, विशाल मंदिर, चट्टानों की ऊँची -ऊँची सीढ़ियाँ और खंभे सब अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। यह मंदिर मदुरै से आठ किलोमीटर दूर है। इसे थिरुप्परमकुनरम मुरुगन मंदिर भी कहते हैं। भगवान मुरूगन के साथ-साथ भगवान शिव , भगवान विष्णु , भगवान विनायक और देवी दुर्गा भी यहाँ स्थापित हैं। पौराणिक कथा या किवदंती है कि इस स्थान पर भगवान मुरुगा ने देवराज इंद्र की पुत्री देवयानी से विवाह किया था।

हमलोग निराश होने लगे। लगा, बिना दर्शन के वापस लौटना होगा। तभी थोड़े उम्रदराज, पुजारी जैसे लगाने वाले एक व्यक्ति हमारे पास आए। वे अपनी भाषा में कुछ कह रहे थे। पर हमें कुछ समझ नहीं आया। हमने हिंदी और अँग्रेजी में उनसे विशिष्ट (वी आई पी ) टिकट पाने का स्थान पूछा। पर वे हमारी बात नहीं समझ सके। किसी तरह हम इशारे से यह समझाने में सफल हुए कि हम मंदिर में दर्शन करना चाहते है। उन्होने हम सभी को अपने पीछे आने का इशारा किया और तत्काल अपने साथ मंदिर के अंदर ले गए। सभी ने उन्हे और हम सभी को तुरंत अंदर जाने का मार्ग दिया। मंदिर के गर्भगृह के सभी पुजारियों ने उन्हे बड़े सम्मान से प्रणाम किया और हमें दर्शन कराया। वे शायद वहाँ के सम्मानीय और महत्वपूर्ण पुजारी थे।
गर्भगृह से बाहर आ कर उन्होने एक जगह बैठने का इशारा किया। थोड़े देर में वे फूल, माला और प्रसाद के साथ लौटे। हमें बड़े प्यार से टीका लगाया और प्रसाद दिया। हम हैरान थे। एक प्रतिष्ठित और उच्च पदासीन पुजारी हम अनजान लोगों की इतनी सहायता क्यों कर रहे हैं? हमे लगा अब पुजारी जी अच्छी दक्षिणा की मांग करेंगे।
अतः मेरे पति अधर ने उन्हे कुछ रुपये देना चाहा। पर उन्होने लेने से इंकार कर दिया। हमारे बार-बार अनुरोध पर सामान्य सी धन राशि दक्षिणा स्वरूप ली।
इस घटना ने हमे पुजारी और ईश्वर की लीला के सामने नत मस्तक कर दिया। हम सभी एक अजनबी शहर के अजनबी पुजारी के सौजन्य की यादों के साथ वापस लौटे।

कामख्या मंदिर – (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथायें )

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

                                                                  क्लीं क्लीं कामाख्या क्लीं क्लीं नमः |

दिनांक – 9.2.2015, मंगलवार। समय संध्या 4:15
आसाम का गौहाटी शहर विख्यात कामख्या मंदिर के लिए जाना जाता है। यह एक शक्ति पीठ है। यह मंदिर वर्तमान कामरूप जिला में स्थित है। माँ कामख्या आदिशक्ति और शक्तिशाली तांत्रिक देवी के रूप में जानी जाती हैं। इन्हे माँ काली और तारा का मिश्रित रूप माना जाता है। इनकी साधना को कौल या शक्ति मार्ग कहा जाता है। यहाँ साधू-संत, अघोरी विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं।

आसाम को प्राचीन समय में कामरूप देश या कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना जाता था। यह तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था। प्राचीन काल में ऐसी मान्यता थी कि कामरूप- कामाख्या के सिद्ध लोग मनमोहिनी मंत्र तथा वशीकरण मंत्र आदि जानते है। जिस के प्रभाव से किसी को भी मोहित या वशीभूत कर सकते थे।
वशीकरण मंत्र —

                      ॐ नमो कामाक्षी देवी आमुकी मे वंशम कुरुकुरु स्वाहा|

गौहाटी सड़क मार्ग, रेल और वायुयान से पहुँचा जा सकता है। गौहाटी के पश्चिम में निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत पर यह मंदिर स्थित है। यह समुद्र से लगभग 800 फीट की ऊंचाई पर है। गौहाटी शहर से मंदिर आठ किलोमीटर की दूरी पर पर्वत पर स्थित है। मंदिर तक सड़क मार्ग है।

वास्तु शिल्प – ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण 8वीं सदी में हुआ था। तब से 17वीं सदी तक अनेकों बार पुनर्निर्माण होता रहा। मंदिर आज जिस रूप में मौजूद है। उसे 17वीं सदी में कुच बिहार के राजा नर नारायण ने पुनर्निमित करवाया था। मंदिर के वास्तु शिल्प को निलांचल प्रकार माना जाता है। मंदिर का निर्माण लंबाई में है। इसमें पूर्व से पश्चिम, चार कक्ष बने हैं। जिसमें एक गर्भगृह तथा तीन अन्य कक्ष हैं।

मंदिर की खूबसूरत नक्कासी
मंदिर की खूबसूरत नक्कासी

ये कक्ष और मंदिर बड़े-बड़े शिला खंडों से निर्मित है तथा मोटे-मोटे, ऊँचे स्तंभों पर टिकें हैं। मंदिर की दीवारों पर अनेकों आकृतियाँ निर्मित हैं। मंदिर के अंदर की दीवारें वक्त के थपेड़ों और अगरबत्तियों के धुएँ से काली पड़ चुकी हैं। तीन कक्षों से गुजर कर गर्भ गृह का मार्ग है। मंदिर का गर्भ -गृह जमीन की सतह से नीचे है। पत्थर की संकरी, टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों से नीचे उतर कर एक छोटी प्रकृतिक गुफा के रूप में मंदिर का गर्भ-गृह है। यहाँ की दीवारें और ऊंची छतें अंधेरे में डूबी कालिमायुक्त है।

इस मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है। वरन पत्थर पर योनि आकृति है। यहाँ पर साथ में एक छोटा प्रकृतिक झरना है। यह प्रकृतिक जल श्रोत इस आकृति को गीली रखती है। माँ कामाख्या का पूजन स्थल पुष्प, सिंदूर और चुनरी से ढका होता है। उसके पास के स्थल/ पीठ को स्पर्श कर, वहाँ के जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

उसके बगल में माँ लक्ष्मी तथा माँ सरस्वती का स्थान/ पीठ है। यहाँ बड़े-बड़े दीपक जलते रहते हैं। गर्भगृह से ऊपर, बाहर आने पर सामने अन्नपूर्णा कक्ष है। जहाँ भोग प्रसाद बनता है। मंदिर के बाहर के पत्थरों पर विभिन्न सुंदर आकृतियाँ बनी हैं। मंदिर का शिखर गोलाकार है। यह शिखर मधुमक्खी के गोल छत्ते के समान बना है।

मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे  की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज
मधुमक्खी के छट्टे की आकृती का -कामाख्या मंदिर का गुंबज

बाहर निकाल कर अगरबत्ती व दीपक जलाने का स्थान बना है। थोड़ा आगे नारियाल तोड़ने का स्थान भी निर्दिष्ट है। पास के एक वृक्ष पर लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए धागा लपेटते हैं। मंदिर परिसार में अनेक बंदर है। जो हमेशा प्रसाद झपटने के लिए तैयार रहते है। अतः इनसे सावधान रहने की जरूरत है।

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की योनि गिरी थी। जो सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी।

इस से व्यथित, विछिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया। सती के मृत शरीर को ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सति के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा की प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत शरीर के खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर गए। शरीर के अंग जहां भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। कामाख्या उनमें से एक है। संस्कृत में रचित कलिका पुराण के अनुसार कामाख्या देवी सारी मनोकामनाओं को पूरा करनेवाली और मुक्ति दात्री शिव वधू हैं।

                      कामाक्षे काम सम्मपने कमेश्वरी हरी प्रिया,
                    कामनाम देही मे नित्यम कामेश्वरी नामोस्तुते||

अंबुवासी पूजा- मान्यता है कि आषाढ़ / जून माह में देवी तीन दिन मासिक धर्म अवस्था में होती हैं। अतः मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन मंदिर सृष्टि, जीवन रचना और शक्ति के उपासना उत्सव के रूप में धूम धाम से खुलता है।मान्यता है कि इस समय कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है।

2) एक अन्य किवदंती के अनुसार असुर नरका कमख्या देवी से विवाह करना चाहता था। देवी ने नरकासुर को एक अति कठिन कार्य सौपते हुए कहा कि अगर वह एक रात्रि में निलांचल पर्वत पर उनका एक मंदिर बना दे तथा वहाँ तक सीढियों का निर्माण कर दे। तब वे उससे विवाह के लिए तैयार हैं। दरअसल किसी देवी का दानव से विवाह असंभव था। अतः देवी ने यह कठिन शर्त रखी। पर नरकासुर द्वारा इस असंभव कार्य को लगभग पूरा करते देख देवी घबरा गई। तब देवी ने मुर्गे के असमय बाग से उसे भ्रमित कर दिया। नरकासुर ने समझा सवेरा हो गया है और उसने निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया और शर्त हार गया। नरकासुर द्वारा बना अधूरा मार्ग आज मेखला पथ के रूप में जाना जाता है।

3)एक मान्यता यह भी है कि निलांचल/ कामगिरी/ कामाख्या पर्वत शिव और सती का प्रेमस्थल है। देवी कामाख्या सृष्टि, जीवन रचना और प्रेम की देवी है और यह उनका प्रेम / काम का स्थान रहा है। अतः इस कामाख्या कहा गया है।

4) एक कहानी के अनुसार कामदेव श्राप ग्रस्त हो कर अपनी समस्त काम शक्ति खो बैठे। तब वे इस स्थान पर देवी के गर्भ से पुनः उत्पन्न हो शापमुक्त हुए।

5)एक कथा संसार के रचनाकार और सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा से संबन्धित है। इस कहानी के अनुसार देवी कामाख्या ने एक बार ब्रह्मा से पूछा कि क्या वे शरीर के बिना जीवन रचना कर सकते हैं। ब्रह्मा ने एक ज्योति पुंज उत्पन्न किया। जिसके मध्य में योनि आकृति थी। यह ज्योति पुंज जहाँ स्थापित हुई उस स्थान को कामरूप-कामाख्या के नाम से जाना गया।

6) एक अन्य मान्यतानुसार माँ काली के दस अवतार अर्थात दस महाविद्या देवी इसी पर्वत पर स्थित है। इसलिए यह साधना और सिद्धी के लिए उपयुक्त शक्तिशाली स्थान माना जाता है। ये दस महाविद्या देवियाँ निम्नलिखित हैं– भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्मस्ता, त्रिपुरसुंदरी, तारा, घंटकर्ण, भैरवी, धूमवती, मातांगी व कमला।

                                       कामख्ये वरदे देवी नीलपर्वतवासिनी,
                                     त्वं देवी जगत्म मातर्योनिमुद्रे नामोस्तुते ||

मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती
मंदिर परिसर में हनुमान जी की मूर्ती

हुगली की उल्टी धार और डॉलफिन ( यात्रा अनुभव )

कोलकाता के प्रवास के दौरान एक ऐसे होटल में रुकने का अवसर मिला जो हुगली नदी पर है। यह होटल दावा करता है, कि यह भारत भर में नदी पर बना अकेला होटल है। यह वास्तव में अनोखा होटल है। इसमें रहने का अपना मज़ा है। सबसे ख़ास बात है हुगली के पल-पल बदलते रंग को इतने निकट से देखने का अवसर मिलता है। यह होटल हुगली नदी के बीच जहाज के रूप में बना है। इसलिए दिन और रात हर समय नदी को करीब से देखा जा सकता है।
सुबह की लालिमा, जाल लगाते मछुआरे, दिन भर चलती छोटी-बड़ी नावों को देखने का आनंद लाजवाब है। कभी-कभी साधारण नावों और जहाजों के बीच चमचमाता आधुनिक स्टीमार तेज़ गति से इन्हे पीछे छोड़ता तेज़ी से गुजर जाता है। नदी में थोड़ी-थोड़ी दूर पर जेट्टी या घाट बने हैं। जहां से यात्री जहाज चलते रहते हैं। कोलकाता में नाव और जल जहाज यातायात के महत्वपूर्ण साधन है।जो सस्ती और सुविधाजनक है।
इस होटल से नया और पुराना दोनों हावड़ा पुल नज़र आता है। दूर, नदी के दूसरे किनारे पर हावड़ा रेलवे-स्टेशन नज़र आता है। नदी के दूसरे तट पर मंदिर और अनेकों जेट्टी/ घाट नज़र आते हैं। यहाँ रात का एक अलग मनमोहक नज़ारा होता है। बहुत से नाव, जहाज और बजरे सजे-धजे, रंगीन रौशनी से नहाए इधर-उधर पानी पर तैरते दिखते हैं। ये पर्यटकों से भरे होते हैं। एक जहाज तो जलपरी के आकार और सजावट वाला है।
इस चहल-पहल को देखने की चाहत में एक और दुर्लभ चीज़ नज़र आई। वह है हुगली/ गंगा डॉलफिन। मेरी छोटी पुत्री चाँदनी ने फोन पर मुझसे कहा था कि गंगा में डॉलफिनें हैं। पर मुझे वे नज़र नहीं आई थीं। इस होटल में रहने के दौरान मैंने अनेक बार डॉलफिनों को देखा। गंगा की डॉलफिनें शायद थोड़ी शर्मीली हैं। वे जल सतह पर कम समय के लिए आ कर तुरंत ही डुबकी लगा लेती हैं। अक्सर वे पानी की सतह पर तभी दिखती हैं जब पानी साफ-सुथरा हो। शायद गंदगी से उन्हें भी घुटन होती है।
इस होटल में रुक कर एक अजीब नज़ारा हुगली नदी में देखने को मिला। हुगली नदी बड़ी विशाल है। अक्सर इसकी सतह पर कुछ न कुछ कचरा तैरता नज़र आ जाता है। पर यह नदी चौड़े पाट में बड़ी शांति से कुड़े-कचरे के बोझ को लिए बहते रहती है। जल प्रवाह बंगाल की खाड़ी की ओर प्रवाहित होती रहती है। पर अचानक मैंने देखा कि जल प्रवाह उल्टी दिशा में होने लगा। अर्थात गंगा (हुगली) उल्टी बहने लगी। गंगा उल्टी बहना मुहावरे में जरूर कहा जाता है, पर वास्तव में ऐसा देख कर हैरानी होने लगी। लोगों के बताया कि यहाँ ऐसा अक्सर होता है। साथ ही नदी का जल स्तर या पानी का उतरना चढ़ना होता रहता है। दरअसल समुद्र यहाँ से बिलकुल करीब है। अतः यह समुद्र के ज्वार-भाटा का असर है। पर यह दृश्य मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। इस उल्टी धार में सारे कुड़े कर्कट पानी के साथ वापस आने लगा। शायद समुद्र इन्हे लौटा रहा था। काश हम सब इस इशारे को समझ नदी और जल जीवों की मदद कर सकें।

गंगासागर -एक यात्रा गंगा की सागर तक (यात्रा संस्मरण और पौराणिक कथाएँ )

15 फरवरी, रविवार, 2015,
कोलकाता से सुबह लगभग आठ बजे हम सब कार से गंगासागर जाने के लिए निकले। यह यात्रा हमारे मित्र श्री राहुल पवार और उनकी पत्नी श्रीमती सीमा पवार के सौजन्य से संभव हुआ। उन्होने यह कार्यक्रम पहले से बना रखा था। उनके आमंत्रण पर अधर और मैंने उनके साथ अपना कार्यक्रम बना लिया। यह दूरी रेल या बस द्वारा भी तय किया जा सकता है।
गंगासागर या सागरदीप गंगा नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन स्थल है। यह पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में पड़ता है। गंगासागर वास्तव में एक टापू है। जो गंगा नदी के मुहाने पर है। यहाँ काफी आबादी है। यह पूरी तरह से ग्रामीण इलाका है। यहाँ की भाषा बंगला है। यहाँ पर रहने के लिए होटल मिलते है। साथ ही विभिन्न मतों के अनेकों आश्रम भी है। गंगासागर एक पवित्र धार्मिक स्थल है। जहां मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को वृहत मेला लगता है। जिसमें लाखों लोग स्नान और पूजा करने आते हैं। ताकि उनके पाप धुल जाये और आशीर्वाद प्राप्त हो। यह एक पुण्यतीर्थ स्थान है।

हम सभी सड़क मार्ग से गंगासागर जाने के लिए कोलकाता से डायमंड हार्बर होते हुए लगभग 98 किलोमीटर दूर काकदीप पहुँचे। यहाँ से घाट या जेट्टी तक जाने का 10 मिनट का पैदल मार्ग है। जो बैट्री चालित कार या खुले ठेले पर बैठ कर भी पहुँचा जा सकता है। यहाँ गंगा / हुगली नदी को पार करना पड़ता है। काकदीप से पानी के जहाज़ के द्वारा आधे घंटे की यात्रा के बाद हम कचूबेरी घाट पहुँचे। जहाज का टिकिट मात्र आठ रुपए हैं। जहाज़ पर 30 मिनट की यह यात्रा बड़ी सुहावनी है। जल पक्षियों के झुंडों को देखने और दाना डालने में यह समय कब निकाल जाता है, पता ही नहीं चलता है। ये पक्षी भी अभ्यस्त है। दाना फेकते झुंड के झुंड पक्षी हवा में ही दाना पकड़ने के लिये झपटते हैं। बड़ा मनमोहक दृश्य होता है। इन जहाजों का आवागमन ज्वार-भाटे पर निर्भर करता है। ज्वार-भाटे के कारण जल धारा की दिशा बदलती रहती है। जब जल प्रवाह सही दिशा में होता है तभी ये जहाज़ परिचालित होते है। अन्यथा ये सही समय का इंतज़ार करते हैं।
कचूबेरी घाट पहुँच कर बस, कार या जुगाड़ से आगे की यात्रा की जा सकती है। यहाँ से गंगासागर / सागरद्वीप लगभग 32 किलोमीटर दूर है। बस वाले 20 रुपये प्रति व्यक्ति लेते है और पूरी टॅक्सी का किराया 5 से 6 सौ रुपये हैं। मार्ग में यहाँ के गाँव नज़र आते हैं। ये मिट्टी की झोपड़ियों और तालाबों वाले ठेठ बंगाली गांव होते है। सड़क के दोनों तरफ हरे-भरे खेत, नारियल के लंबे पेड़, बांस के झुरमुट और केले के पौधे लगे होते हैं। काफी जगहों पर पान की खेती भी नज़र आती है।
गंगासागर पहुँच कर कपिल मुनि का मंदिर नज़र आती है । सामने एक लंबी सड़क जल प्रवाह की ओर जाती है। जिसे पैदल या ठेले पर जाया जा सकता हैं। सड़क के दोनों ओर पूजन सामाग्री की दुकाने है। यहाँ पर भिक्षुक और धरमार्थियों की भीड़ दिखती है। साथ ही झुंड के झुंड कुत्ते दिखते है। दरअसल गंगासागर में स्नान और पूजन के बाद भिक्षुक को अन्न दान और कुत्तों को भोजन / बिस्कुट देने की प्रथा है।
गंगासागर पहुँचने पर दूर-दूर तक शांत जल दिखता है। यहाँ सागर का उद्दाम रूप या बड़ी-बड़ी लहरें नहीं दिखती है। शायद गंगा के जल के मिलन से यहाँ जल शांत और मटमैला दिखता है। पर दूर पानी का रंग हल्का नीला-हरा नीलमणि सा दिखता है। प्रकृतिक का सौंदर्य देख कर यात्रा सार्थक लगती है। लगता है, मानो गंगा के साथ-साथ हमने भी सागर तक की यात्रा कर ली हो।
हमलोगों ने जल में खड़े हो कर पूजा किया और प्रथा के अनुसार लौट कर मंदिर गए। मंदिर में मुख्य प्रतिमा माँ गंगा, कपिल मुनि तथा भागीरथी जी की है। ये प्रतिमाएँ चटकीले नारंगी / गेरुए रंग से रंगे हुए हैं। इस मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। इस मंदिर का निर्माण 1973 में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि पहले के वास्तविक मंदिर समुद्र के जल सतह के बढ्ने से जल में समा गए है।
किवदंती-
1) ऐसा माना जाता है कि गंगासागर के इस स्थान पर कपिल मुनि का आश्रम था और मकर संक्रांति के दिन गंगा जी ने पृथ्वी पर अवतरित हो 60,000 सगर-पुत्रों कि आत्मा को मुक्ति प्रदान किया था।

 

ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। पर विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनी के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। पर उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि ऐसे में भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान लिया और कपिलमुनी का जन्म हुआ। फलतः उन्हें विष्णु का अवतार माना गया। आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे।
इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहाँ से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है। राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60,000 हज़ार पुत्रों को भेजा।
अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गए। खोजने पर यज्ञ अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिले। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज़ हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज़ हो कर उन्हे शापित किया और उन सभी को अपने नेत्रों के तेज़ से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागिरथ कपिल मुनि से माफी माँगने पहुँचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60,000 मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रांति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए इस पर स्नान का इतना महत्व है।
कहतें है कि भगवान इंद्रा ने यज्ञ अश्वों को जान-बुझ कर पाताल लोक में छुपा दिया था। बाद में कपिल मुनि के आश्रम के पास छोड़ दिया। ऐसा उन्होने ने गंगा नदी को पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए किया था। पहले गंगा स्वर्ग की नदी थीं। इंद्र जानते थे कि गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने से अनेकों प्राणियों का भला होग।
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इस पवित्र तीर्थयात्रा से हम सभी लौट कर पास में त्रिय योग आश्रम गाए। यह उड़ीसा के जगन्नाथपूरी मंदिर के तर्ज़ पर कृष्ण सुभद्रा और बलराम का मंदिर है। साथ ही शिवलिंग भी स्थापित है। यहाँ हमें शुद्ध और सात्विक भोजन मिला। जिससे बड़ी तृप्ति मिली। इसके बाद हम रात ९ बजे तक कोलकाता वापस लौट आए। इस तरह से हमने एक महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा पूरी की। जिससे बड़ी आत्म संतुष्टी मिली। कहा जाता है –

                                        सब तीर्थ बार-बार, गंगासागर एक बार।

क्रिसमस की पूर्वसंध्या (यात्रा संस्मरण)

कड़ाके की ठंड थी। इस ठंड में सुबह-सुबह तैयार होना एक बड़ा काम था। पर समय पर हवाई-अड्डा पहुँचना था। जल्दी-जल्दी तैयार हो कर सुबह 8 बजे हमलोग घर से निकले। हमें लखनऊ से पुणे जाना था। गनीमत थी कि हम समय पर पहुँच गए। घड़ी देख कर चाँदनी, अधर और मैं खुश हुए, चलो देर नहीं हुई।
आधे घंटे के बाद फोन पर खबर मिली कि कोहरे के कारण हवाई जहाज 30 मिनट देर से जाएगा। लखनऊ में कोहरा कुछ कम है। पर दिल्ली में घना कोहरा है। पर यह देर होने का सिलसिल लगभग दो घंटे चला। हम दो बजे दिल्ली पहुँचे। वहाँ से  पुणे के जहाज का समय दोपहर 2:30 में था। इसलिए हमलोग बेफिक्र थे क्योंकि दोपहर में दिल्ली का मौसम बिलकुल साफ था और पुणे में इतनी ठंड नहीं होती है कि जहाज़ को उतरने में कोहरे की समस्या का सामना करना पड़े। पर किसी कारणवश इस हवाई जहाज के समय में भी देर होने लगा। बार-बार नज़र शीशे के बाहर के मौसम पर जा रही थी। घड़ी की सुइयाँ जैसे-जैसे आगे जा रही थी, कोहरे का असर बढ़ता जा रहा था। अगर कोहरा ज़्यादा हो जाएगा तब ना जाने हवाई जहाज का क्या होगा? ढ़ेरो जहाज इस वजह से स्थगित हो रहे थे।
सूर्य पश्चिम की ओर तेज़ तेज़ी से बढ़ रहा था। लगभग 4:30 बजे शाम का समय हो चुका था। मन ही मन मैं मना रही थी कि जहाज जल्दी यहाँ से उड़ान भर ले। सूरज लाल गोले जैसा दिख रहा था। चारो ओर लाली छा गई थी। क्रिसमस की पूर्वसंध्या बड़ी खूबसूरत थी। धीरे-धीरे पश्चिम में डूबता सूरज बड़ा सुंदर लग रहा था। मैं उसकी सुंदरता को निहार रही थी। पाँच बजे शाम में सूर्य अस्त हो गया। हवाई-अड्डे के शीशे से बाहर धुंध नज़र आ रहा था। कोहरा घना हो रहा था। लगा अब हमारी उड़ान के रद्द होने की सूचना ना आ जाए। पर तभी हमे हवाई जहाज के अंदर जाने की सूचना दी गई। थोड़ी राहत तो हुई। पर अंदर बैठने के बाद भी नज़र खिड़की से बाहर घने हो रहे कोहरे पर थी। समझ नहीं आ रहा था कि इस हल्के धुंध भरे कोहरे में जहाज़ अगर उड़ान भर भी ले तो आगे कैसे जाएगा, क्योंकि अब तो कोहरा बढ़ता ही जाएगा। मैं इसी चिंता में थी और जहाज़ ने उड़ान भरी। मैंने आँखें बंद कर माथा सीट पर टिका लिया।
विमान बहुत ऊंचाई पर आ गया था। थोड़ी देर बाद मेरी नज़रें विमान की खिड़की के बाहर गई। जहाज़ के पंख पर तेज़ रोशनी चमक रही थी।  बाहर तेज़ धूप थी और सूर्य जगमगा रहा था। मैं हैरान थी। नीचे झाँका तो पाया कोहरे की मोटी चादर नीचे रह गई थी। हमारा जहाज कोहरे के मोटी चादर से ऊपर था। ऊंचाई पर कोहरा नहीं था। वहाँ सूरज चमचमा रहा था। संध्या 5:30 में सूर्य फिर से अस्त होता हुआ नज़र आया। यहाँ से सूर्ययास्त और भी लाजवाब लग रहा था। नीचे अंधकार जैसा था। दूर छितिज पर धरती और आकाश मिलते हुए दिख रहे थे। पूरा आसमान डूबते सूरज के लाल और नारंगी रंग में रंगा था। नज़रों के सामने एक और खूबसूरत शाम थी। एक दिन में दो बार सूर्यास्त देख कर रोमांच हो आया। एक सूर्यास्त धरती पर और दूसरा आकाश की ऊंचाइयों पर।  क्रिसमस की यह पूर्वसंध्या मेरे लिए यादगार बन गई।

यात्रा वृतांत – कालीघाट मंदिर कोलकाता

कोलकाता का विश्व विख्यात कालीघाट मंदिर भारत के किसी सामान्य उत्तर भारतीय मंदिर की तरह नज़र आता है। मंदिर की सड़क पर पहुचते ही पंडो का शोर शुरू हो जाता है। अब यह भक्त के ऊपर है कि पंडो की मदद ले या नहीं। आगे बढ़ने पर वही शोर-शराबा, पूजा सामग्री की ढेरो दुकाने, बिखरे फूल, भीख मांगते लोगों की भीड़। फिर नज़र आया पवित्र मंदिर। मंदिर के अंदर के खूबसूरत सफ़ेद जमीन पर गंदे पैरो के छाप दिखते है। मिट्टी- कीचड़ लगी फर्श नीचे अभी भी सुंदर होगी, यह समझ में आता है। संगमरमरी जमीन कीचड़ सना होने पर भी पर भी पवित्र लगता है। पर मन मे ख्याल आता है- काश यह साफ सुथरा होता। तब लगता है, हम लोग ही तो बार-बार फूल, चन्दन और जल ड़ाल कर मंदिरो का यह हाल करते है- पुनि-पुनि चन्दन, पुनि-पुनि पानी…………….
पंडो की मांगो, भीड़ के धक्को के बाद मंदिर के गर्भ-गृह में पहुँचना एक बड़े उपलब्धि का एहसास दिलाता है। अधर के तीन वर्ष के काली घाट, पंजाब नेशनल बैक कलकत्ता के प्रवास के दौरान बने अच्छे संबंधो का असर साफ नज़र आता है। वहाँ के एक महत्वपूर्ण पंडित जी ने अधर को तुरंत पहचान लिया। उनके सौजन्य से बड़ी सुविधा के साथ हम दोनों एकदम देवी के सामने पहुँच गए। देवी पर चढ़े लाल जवाफूल के बड़े बड़े हार प्रसाद स्वरूप हमारे गले में ड़ाल दिए। साथ ही मिला देवी पर चढ़ा सिंदूर, चुनरी, चूड़ी, आलता और प्रसाद। देवी प्रतिमा देख कर मन श्रद्धा से भर गया। पारस पत्थर की विशाल प्रतिमा भव्य और सुंदर है। देवी के चारो हाथ और लंबी, बाहर निकली जिव्हा स्वर्णमंडित है। एक हाथ मे तलवार है, जो पवित्र दैवी ज्ञान का सूचक है। दूसरे हाथ में नरमुंड है। जो मनुष्य के अहं का सूचक है और यह दर्शाता है कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए ईश्वरीय ज्ञान से अपने अहं का नाश करना जरूरी है। है। देवी के अन्य दो हाथ अभय और आशीर्वाद मुद्रा में है। यानि देवी के सच्चे भक्तों पर उनका आशीर्वाद हमेशा रहता है।
कालीघाट ५१ शक्तिपीठों में एक है। सती के शरीर के विभिन्न हिस्से जहाँ भी गिरे वहा शक्ति पीठों का निर्माण हुआ। मान्यता है कि कालीघाट में सती का दाहिना चरण गिरा था।
बाहर से सामान्य दिखनेवाला मंदिर एक अदभुत शांति और शक्ति का एहसास देता है। लगा जैसे माँ मेरी हर बात सुन रही है और उनका आशीर्वाद हमारे ऊपर सर्वदा से बना है। मैं मन ही मन देवी मंत्र जपने लगी-
ॐ ऐ ह्री क्लीं चामुंडाये विच्चे॥
फिर कामना करने लगी-
देहिसौभाग्यारोग्यम, देहि मे परमसुखम।
रूपं देहि जय देहि यशो देहि द्विषोजहि॥

हम सभी की बचपन से एक आदत बन जाती है। किसी मंदिर प्रांगण में पहुँच कर प्रतिमा के आगे नतमस्तक हो जाना। फिर मन की सभी कामनाएँ हम ईश्वर के सामने दुहराने लगते है। साथ ही अपनी गलतियों को भी स्वीकार करने लगते है।उसे धन्यवाद भी देते हैं।
आखिर ऐसा क्या होता है इन हिम-शीतल प्रस्तर प्रतिमाओ में? ये प्रतिमाएँ हमें सजीवता का अहसास क्यों देती है? दरअसल धर्म मनुष्य के काउन्सेलिंग की एक स्वाभाविक पद्धति है, जो बचपन से धीरे-धीरे अनजाने ही हम सीखते जाते हैं और फिर यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। मन तो हमेशा भागता है।पर उसे साधने का कितना सरल तरीका है। बस इसे सीखने की जरूरत है।
ईश्वर की प्रस्तर प्रतिमा हमें अपनी भावनाओ को निर्भीक रूप से व्यक्त करने का अवसर देती है। मन में पूरा विश्वास रहता है कि ये बातें मेरे और ईश्वर के बीच है। हमें अपनी बातों के सुनवाई का पूरा विश्वास होता है। जैसे हम किसी काउंसिलर को निर्भीक रूप से अपनी समस्याओं को बताते है और हमारा मन हल्का हो जाता है।
यह मन अनेक समस्याओं का जड़ है। जब मन में भरी बातें बाहर निकलती है तब मन हल्का लगने लगता है। यह हमारे मन को निर्मलता की भावनाओ और आत्मविश्वास से भर देता है। हमारा धर्म मनुष्य के काउन्सेलिंग की एक स्वाभाविक पद्धति है, जो बचपन से धीरे-धीरे अनजाने ही हम सीखते जाते हैं और फिर यह हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाता है।

तारापीठ ( यात्रा वृतांत और रोचक किंवदंतियां )

    16 नवम्बर, रविवार, समय दोपहर 12:15 का था।  मैं, अधर, हमारे पारिवारिक मित्र श्री सी.ए.के. मिश्रा एवं श्रीमती मिश्रा (आरती जी) तथा कार चालक अरुण जी तारापीठ पहुँचे। यह यात्रा श्री मिश्रा जी के सौजन्य से संभव हुआ। मैं और अधर लखनऊ से दुर्गापुर आए हुए थे। दुर्गापुर से हमलोग सड़क मार्ग से तारापीठ गए। आध्यत्मिक अौर धार्मिक  यात्रा के रुप में यह  एक अविस्मरणीय अनुभवा रहा।

तारापीठ, साहपुर ग्राम पंचायत, मारग्राम पुलिस स्टेशन का एक छोटा सा गाँव है| तारापीठ बीरभूम जिले में है।यहाँ तारापीठ रेलवे स्टेशन है। रामपुर हाट निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन है जो यहाँ से लगभग 5-6 किमी दूर है। आसनसोल रेलवे स्टेशन भी यहाँ से करीब है। यहाँ रुकने के लिए अनेक होटल हैं। मंदिर मेँ दर्शन के दो मार्ग है। पहला सामान्य दर्शनार्थियों के लिए जो निःशुल्क है। दूसरा मार्ग उन विशिष्ट लोगों के लिए है जो 200/ रु का प्रवेश टिकिट लेते हैं। उन्हें आविलम्ब दर्शन की सुविधा प्राप्त होती ही। मंदिर दोपहर मेँ एक से दो बजे बंद कर दिया जाता है। इस समय माँ को भोग लगाया जाता है। यह हमलोगों के लिए एक यादगार यात्रा थी। तारापीठ के पहले हमलोगों ने वक्रेश्वर महादेव का दर्शन भी किया। शिव (वक्रेश्वर महादेव) और शक्ति (माँ तारा) का दर्शन सौभाग्य की बात है। वक्रेश्वर महादेव के मंदिर का स्थान गर्मपानी के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर और देवी का रूप – तारापीठ भारत भर में स्थित 51 पवित्र शक्ति पीठ में से एक है। पश्चिम बंगाल में द्वारका नदी के तट पर तारापीठ हरे-भरे धान के खेतों के बीच मैदानों में स्थित है। यह झोपड़ियों और तालाबों वाला एक ठेठ बंगाली गांव है। मंदिर लाल ईंटों की मोटी दीवारों से निर्मित है। इसमें कई मेहराब और एक शिखर है।

देवी गर्भगृह में स्थित है। गर्भगृह में माँ तारा की जिस मूर्ति को भक्त सामान्य रूप से देखतें है, वह वास्तव मेँ एक तीन फीट की धातु निर्मित मूर्ति है। जिसे वास्तविक पाषाण प्रतिमा पर सुशोभित किया जाता है। इसे देवी का राजवेश कहा जाता है।मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थीं। अतः उन्होंने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है। देवी के माथे पर लाल कुमकुम की बिंदी है। पुजारी इस कुमकुम / सिंदूर का एक तिलक माँ तारा के आशीर्वाद स्वरूप भक्तों के माथे पर लगाते हैं। माँ तारा की मौलिक मूर्ति देवी के रौद्र और क्रोधित रूप को दिखाता हैइसमें माँ तारा को बाल शिव को दूध पिलाते दर्शाया गया है। यह मूर्ति पत्थर की है। देवी के गले मेँ मुंडमाल है। मुख और जिव्हा रक्तरंजित है। चार हाथों मेँ विभिन्न हथियार सुशोभित है। जब 4:30 बजे सुबह मंदिर खुलता है तब केवल भाग्यशाली भक्तों को देवी के इस रूप के दर्शन का मौका मिलता है। मंदिर के परिसर में पवित्र “जीवित तालाब” निर्मित है।किवदंती है कि इस ताल में मृत को भी जीवित करने की शक्ति थी।

चढ़ावा या भोग – यहाँ भक्तगण समान्यतः नारियल, पेड़ा, सिंदूर, अगरू, चन्दन, गुलाबजल, आलता, फल, चुनरी, कमल, कनेर, नीला अपराजिता, जवा पुष्प या गेंदे की माला, बेलपत्र, नीली या लाल साड़ियां चढ़ते हैं। देवी को रुद्राक्षा माला भी प्रिय है क्योंकि मान्यता है कि रुद्राक्ष भगवान रुद्र (शिव का क्रोधी मुद्रा) के नेत्र के अश्रु बिन्दु से निर्मित हुए है।

कच्ची हल्दी का माला और नींबू की माला भी देवी को प्रिय है। गर्भगृह के ठीक बाहर माँ तारा के युगल चरण द्वय हैं। जिस पर आलता डाला जाता है। तांत्रिक पद्धति के अनुसार कुछ भक्त आसव या मदिरा की बोतलें और अस्थि निर्मित माला का  प्रयोग पूजा के लिए करते हैं। यहाँ छाग या खस्सी की बलि भी दी जाती है। मछली, खीर, दही, शहद मिश्रित चावल, शोल मछली, खस्सी का मांस आदि भी देवी को प्रिय है। वृहदनील तंत्र के दूसरे अध्याय में इसका निम्नलिखित वर्णन मिलता है-

मधुपर्कं विशेषेण देविप्रीतिकरं परम्।
सन्देश-मुष्णंदद्दाच्च लड्डू-कादि-समन्वितम्॥२-८३॥
पायसं कृसरं दद्दाच्छर्करा-गुडसंयुक्तम्।
आज्यंदधि मधुन्मिश्रं तथान्नानि निवेदयेत् ॥२ -८४॥
शाल-मत्स्यं च पाठीनं गोधिका-मंस-मुत्तमम्।
अन्नं च मधुना मिश्रं यंत्राद् दद्दाच्च मंत्रवित् ॥२-८६॥
छाग-देवी माँसं तथा देवी रोहितं मतस्य-भर्जितम्।
योनिमुद्रां प्रदर्श्याथ आज्ञांप्राप्य यथाविधि ॥२-८७॥

महाश्मशान भूमि

बंगाल वामाचार, तंत्र साधना और शक्ति उपासना का प्राचीन केंद्र है। तारापीठ मेँ भी तंत्र साधना प्राचीन कल से प्रचलित है। श्मशान भूमि शक्ति उपासना का अभिन्न अंग माना जाता है। श्मशान भूमि जंगल परिवेश के बीच, सामाजिक जीवन और व्यवस्था से दूर होता है। तारापीठ मेँ श्मशान भूमि शहर की सीमा के अंत में नदी किनारे पर स्थित है। इस श्मशान भूमि और मंदिर में बामखेपा अवधूत ने एक भिक्षुक के रूप में साधना किया था। उन्होंने माँ तारा की पूजा करने के लिए अपने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका आश्रम भी मंदिर के करीब स्थित है। मंदिर परिसर मेँ उनकी मूर्ति स्थापित है। अपने गुरु संत कैलाशपति के संरक्षण मेँ बामखेपा अवधूत ने योग का ज्ञान और तांत्रिक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।

तांत्रिक साधकों का मानना है कि माँ उग्र तारा का पसंदीदा स्थान श्मशान भूमि है। इसलिए बहुधा देवी तारा का मूर्तिरूप में चित्रण श्मशान भूमि के आस-पास किया जाता है। तारा,श्मशान भूमि, हड्डियों और कंकाल की ओर आकर्षित होती है, इस विश्वास के साथ तांत्रिक साधक यहाँ साधना करने के लिए आते है।

कई साधु स्थायी रूप से यहां रहते हैं। राख लिप्त साधु बरगद के पेड़ के नीचे या मिट्टी के झोपड़ियों मे रहते हैं। उनकी झोपड़ियों के दीवार तारायंत्र, लाल सिंदूर आरक्त खोपड़ी से अलंकृत होती हैं। प्रवेश द्वार पर गेंदा की माला और खोपड़ी से सजी माँ तारा की आकृति, त्रिशूल और जलती हुई धुनी आम दृश्य है। वे मानव के साथ-साथ गीदड़ों, गिद्धों की खोपड़ी और साँप की खाल / केंचुली से भी झोपड़ियों को सजाते है। पूजा और तांत्रिक उद्देश्यों के लिए इन वस्तुओं का इस्तेमाल होता हैं।

 

किंवदंतियां- मंदिर और देवी से संबंधित इस जगह की उत्पत्ति और महत्व पर कई किंवदंतियां हैं।

1) एक प्रसिद्ध कथा शक्तिपीठ से संबंधित है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ सती की तीसरी आंख का तारा गिरा था जो, शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक है। सती भगवान शिव की पहली पत्नी थी। सती के पिता ने विराट यज्ञ का आयोजन किया। पर यज्ञ के लिए शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया था। फलतः सती ने अपमानित महसूस किया और सती ने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी। इस से व्यथित, विक्षिप्त शिव ने यज्ञ कुंड से सती के मृत शरीर को उठा लिया।

सती के मृत शरीर ले कर वे अशांत भटकने लगे। शिव सती के मृत देह को अपने कन्धे पर उठा ताण्डव नृत्य करने लगे। फ़लस्वरुप पृथ्वी विध्वंस होने लगी। समस्त देवता डर कर ब्रम्हा और विष्णु के पास गये और उनसे समस्त संसार के रक्षा प्रार्थन की। विष्णु ने शिव को शांत करने के उद्देश्य से अपने चक्र से सती के मृत      दग्ध शरीर को खंडित कर दिया। फलतः सती के शरीर के अंग भारत उपमहाद्वीप के विभिन्न स्थानों पर गिर पड़े। शरीर के अंग जहाँ भी गिरे उन स्थानों पर विभिन्न रूपों में देवी की पूजा के केंद्र बन गए और शक्तिपीठ कहलाए। ऐसे 51 पवित्र शक्तिपीठ हैं। तारापीठ उनमें से एक है। माना जाता है कि यहाँ सती के शक्तिशाली तृतीय नेत्र का तारा गिरा था। इसलिये यह तारापीठ कहलाया और शक्ति, विनाश और क्रोध का प्रतीक माना गया। अतः इसे साधना के लिए शक्तिशाली स्थल माना गया है।

) दूसरी कहानी यहाँ स्थापित देवी के मौलिक मूर्ति से संबन्धित है। ब्रह्मांड को बचाने के लिए महासागरों के मंथन से निकला हलाहल यानि गरल पान शिव ने किया। जहर के प्रभाव से बचने के लिए शिव ने गरल को गले मेँ धारण कर लिया। जिससे उनका गला नीला पड़ गया और शिव नीलकंठ नाम से पुकारे जाने लगे।

इस कालकूट जहर को पीने से उन्हे गले में तीव्र जलन उत्पन्न हुई। तब तारा के रूप में सती ने जहर के प्रभाव से शिव को राहत देने के लिए अपना स्तनपान कराया। उन्होंने शिव को बालरूप में परिवर्तित कर, अपनी गोद में ले कर दुग्धपान करवाया। जिससे शिव के गले की जलन शांत हुई। तारापीठ की मौलिक पाषाण प्रतिमा में यहीं रूप चित्रित किया गया है।

3) ऐसी मान्यता है कि महर्षि वशिष्ठ, देवी तारा की पूजा करने और हिंदुओं के बीच उसकी पूजा के महत्व का प्रसार करने वाले पहले व्यक्ति थे। सतयुग में महर्षि वशिष्ठ के पिता भगवान ब्रह्मा ने उन्हें सिद्धि प्राप्त करने के लिए देवी तारा की पूजा करने कहा। ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र वशिष्ठ​ को तारा मन्त्र की  दिक्षा दी और मन्त्र सिद्ध करने कहा।

पिता के आज्ञानुसार वशिष्ठ​ निलान्चल पर्वत पर गये और देवी माँ की साधना करने लगे। परन्तु सिद्धि नहीं प्राप्त हुई। तब वे अपने पिता ब्रह्मा के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें निलान्चल छोड नील-पर्वत पर तपस्या करने कहा। परन्तु उन्हें इस बार भी सफलता नहीं मिली। अतः उन्हें लगा कि इस मंत्र को सिद्ध नही किया जा सकता है। तभी आकाशवाणी हुई,वशिष्ठ​ तुम चीन देश जाओ और वहाँ भगवान बुद्ध से साधन का सही विधि और क्रम​ जान कर मेरी अराधना करो।
वशिष्ठ मुनि चीन पहुंचे। वहाँ मुनि ने देखा कि भगवान बुद्ध मदिरा, माँस, मतस्य, नृत्य करती हुई नृत्यागंनायों के साथ व्यस्त है। यह देख वे मायूस हो कर वहाँ से लौटने लगे। तब बुद्ध ने उन्हें रुकने कहा। जब वशिष्ठ मुनि ने पुनः बुद्ध की ओर देखा तो वो चकित रह गये।

भगवान बुद्ध शान्त बैठे थे और ध्यान योग में थे। उसी तरह नृत्यागनाऐं भी आसन लगा कर बैठी थीं, मदिरा, माँस, मतस्य आदी सभी वस्तुये, पुजन सामाग्रियों में परिवर्तित हो गईं थीं। अन्तर्यामी बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि को माँ तारा के वामाचार पूजन की विधि बताई । उन्होंने बताया कि बैधनाथ धाम के १० योजन पूर्व, वक्रेश्वर के ४ योजन ईशान, जहन्वी के ४ योजन पश्चिम, उत्तर वाहिनी द्वारीका नदी के पूर्व, देवी सति का उर्ध नयन तारा अर्थात ज्ञान रुपि तृतीय नेत्र गिरा है। वहाँ पन्च मुण्डी आसन बना कर साधना करो। पन्च मुण्डी का अर्थ है दुर्घटना या आकाल मृत्यु को प्राप्त मनुष्य, कृष्ण सर्प, लंगुर, हाथी और उल्लू की खोपडी से बना हुअ आसन। वहाँ देवी तारा माँ के चरण चिन्ह अंकित है। उस स्थान पर देवी माँ के मन्त्र का ३ लाख जप करो और पन्चमकार विधि अर्थात  मदिरा, माँस, मतस्य, मुद्रा तथा मैथुन से पूजा करो। तब तुम्हें देवी माँ की कृपा प्राप्त होगी।
वशिष्ठ मुनि ने बुद्ध के बताए विधि से पन्च मुण्डी आसन का निर्माण किया। फिर देवी अराधना की। फ़लस्वरुप उन्हें देवी माँ ने एक अत्यंत उज्जवल ज्योति के रुप में दर्शन दिया और पूछा कि तुम किस रुप में मेरा साक्षात दर्शन करना चाहते हो। वशिष्ठ मुनि ने उन्हें जगत जननी के रुप में देखने की कामना की।

तब देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि को भगवान शिव को बालक रुप में अपना स्तन पान करते हुये दर्शन दिया। देवी माँ ने वशिष्ठ मुनि से वर मांगने के लिये कहा। वशिष्ठ मुनि ने उत्तर दिया –” आपका दर्शन मेरे लिये सब कुछ है। आप अगर कुछ देना चाहती है तो यह वर दिजिये कि आज के बाद इस आसन पर कोई भी साधक, आप के मन्त्रों का ३ लाख जप कर सिद्धी प्राप्त कर सके।” देवी माँ ने वशिष्ठ को कामनानुसार वर प्रदन किया। माँ तारा ने अपने भगवान शिव को बालक रुप में स्तन पान कराते स्वरूप को शिला में परिवर्तित कर दिय तथा वहीं पर निवास करने लगीं।

महायान तिब्बती बौद्ध धर्म के सन्दर्भ में तारा   (तिब्बती: སྒྲོལ་མ, Dölma) या आर्य तारा एक स्त्री बोधिसत्व हैं। वज्रयान बौद्ध धर्म में वे स्त्री बुद्ध के रूप में हैं। वे “मुक्ति की जननी” के रूप में मान्य हैं तथा कार्य एवं उपलब्धि के क्षेत्र में सफलता की द्योतक हैं। उन्हें जापान में ‘तारा बोसत्सु’ (多羅菩薩) तथा चीनी बौद्ध धर्म में डुओलुओ पुसा कहते हैं।

4) यह किवदंती तारापीठ के आलौकिक मंदिर के स्थापना से संबन्धित है। लगभग १२०० साल पहले देवी माँ के स्थान की पहचान जय दत्त नाम के एक व्यापारी ने किया। जय दत्त अपने पुत्र और साथियों के साथ द्वारका नदी के जल पथ से व्यापार कर लौट रहा था। खाने-पीने का सामान लेने के लिए उन्होंने द्वारिका नदी किनारे, देवी माँ के निवास स्थान पर नाव रोका।

दुर्भाग्यवश वहाँ जय दत्त के पुत्र की सांप काटने से मृत्यु हो गई। दुखी जय दत्त पुत्र के शव नाव पर रख शोक में डूब गया। उसके विलाप को सुनकर देवी ने नाव की खिड़की से जय दत्त से पूछा -” क्यों रो रहे हो? इस नाव में क्या हैं?” पुत्र मृत्यु से शोकाकुल जय दत्त ने बेसुधी में कह दिया- नाव में भस्म भरा पड़ा हैं। तत्काल नाव का सारा सामान राख़ में बदल गया। इस दौरान एक अन्य चमत्कार भी हुआ। उसके साथी नाविकों ने भोजन के लिए पास के तालाब से शोल मछली पकड़ी। उन्होंने उसे काट कर धोने के लिए तालाब के जल में डुबाया। कटी हुई मच्छली अपने आप जुड कर जिवित हो कर तालाब में छलांग लगाकर भाग गई। नाविकों ने जय दत्त को यह अद्भुत घटना सुनाई। तब जय दत्त ने पुत्र के शव को उस तालाब में डाला। चमत्कारिक रूप से वह जीवित हो गया।

सब समझ गये कि इस स्थान पर अवश्य ही कोई आलौकिक शक्ति है। जय दत्त ने उस स्थान पर रह कर उस आलौकिक शक्ति को जानने का प्रण कर लिया। उसने अपने पुत्र सहित कर्मिको को घर लौटा दिया। जय दत्त भक्तिभाव से उस आलौकिक शक्ति को ढूँढने लगा। उसकी भक्ति और पागलपन देख भैरव शिव ने उन्हे दर्शन दिये और उस स्थान से सम्बन्धित समस्त गाथायें सुनाई और उन्हे देवी के मन्त्रों की दिक्षा दी। जय दत्त ने तालाब अर्थात जीवित कुण्ड के किनारे देवी माँ का भव्य मन्दिर बनवाया और शिला मुर्ति को उस मन्दिर में स्थपित कर दैनिक पूजा का प्रबंध किया।

मान्यता है कि देवी शिला मुर्ति के रुप में सभी को दर्शन नही देना चाहती थी। अतः उन्होने एक अन्य आवरण या राजवेश भी उपलब्ध करवाया। यह राजवेश देवी का सौम्य रूप है माँ ने कहा कि शिला मुर्ति को प्रतिदिन से आवरण से ढक दिया जाये। जय दत्त ने देवी माँ के बताये अनुसार मन्दिर का निर्माण करवाया। जिस दिन मन्दिर महा पूजा के साथ सभी भक्तों के लिये खोला गया। जय दत्त ने देखा उस शिला मुर्ति के साथ एक अन्य, देवी माँ का भव्य स्वरुप या राजवेश वहाँ पर है। आज भी देवी माँ के बतये हुये क्रम और विधि के अनुसार पूजा अराधना और पशु बली होती है तथा देवी के निर्देशानुसार राजवेश को मूर्ति पर धारण कराया जाता है। माँ तारा के दर्शन के बाद मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है और मन में मंत्र गुंजने लगता है-                 

“सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
 शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥”


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