क्या सीता जी टेस्ट ट्यूब बेबी थीं ? ( एक विचार )

जनकपुत्री सीता
जनकपुत्री सीता

रामायण महाकथा  के  अनुसार जनक पुत्री  सीता जी उन्हें एक  घड़े   या पात्र   में मिली थीं ।भूमि पुत्री सीता जी के  जन्म के  संबंध में अनेकों किवदंतियाँ है। एक कथानुसार वृहत यज्ञ के बाद  मिथिला नरेश  राजा जनक ने खेतों में हल चलाया। तभी उन को सीता जी खेत में  मिली थीं। खेत जोतने के दौरान उनका   हल या सीत   एक घट से  टकराया, जिसमें तेजोमय , अपूर्व सुंदर कन्या थी।  अतः उन्हें सीता  नाम दिया गया। जिसे उन्होंने गोद लेकर पाला।

एक  अन्य  कथा के अनुसार वे रावण और मंदोदरी पुत्री थीं। विद्वानों ने भविष्यवाणी की, कि सीता  रावण के मृत्यु और लंकादहन  का कारण बनेगी  । अतः रावण ने  मारीच को उन्हें मृत्यु के घाट उतारने का आदेश दिया, पर  तेजोमय कन्या को मारने का साहस न होने के कारण मारीच  उन्हें खेत में   छोड़ लौट गया।

भूमिसुता सीता
भूमिसुता सीता

एक कहानी के अनुसार मिथिला के एक  महत्वपूर्ण मंदिर में पूजा करने के बदले  एक विद्वान ब्राह्मण को  वहाँ के राक्षस को अपना  रक्तान्श, कर के रूप में देना पड़ा। जिसे उस असुर ने  खेत  में   ड़ाल दिया , जहाँ से माता  सीता मिलीं थी। 

रामायण काल के विमान, शक्तिशाली युद्ध अस्त्रा-शस्त्र, जैसी  बातें पहले भले  मात्र कपोल कल्पना  लगती होंगी। पर आज विज्ञान ने इसे हकीकत बना दिया है। तब क्या इसका अर्थ है कि तब विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली थी?

क्या वैसे ही यह सत्य भी कभी समझ आयेगा? आज के वैज्ञानिक खोज, रीसर्च , प्रयोग  तब के यज्ञ नहीं हो सकते क्या? घट  टेस्ट ट्यूब का दूसरा  रूप  नहीं हो सकता है क्या? महाभारत में भी अनेक ऐसे  आलौकिक जन्म की घटनाएँ वर्णित हैं । 

विश्व जैव विविधता दिवस #The International Day for Biological Diversity (IDB)

 

हमारा पर्यावरण
हमारा पर्यावरण

२२ मई का दिन आज के वैश्विक परीप्रेक्ष में पूरी दुनिया में महत्वपूर्ण हो गया है। इस दिन को विश्व जैव विविधता दिवस या विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस के रूप में मनाने का निश्चय संयुक्त राष्ट्र ने किया है। इसे अन्तर्राष्ट्रीय पर्व कहा गया है।

यह संसार विविध जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों से भरा है। सभी किसी ना किसी रूप से एक दूसरे से जुड़े है। पर आज बदलते समय और पर्यावरण से छेड़-छाड़ ने प्रकृती पर असर डालना शुरू किया है। बहुत से जीव और पेड़ पौधे लुप्त हो गए और कुछ लुप्त होने की कगार पर हैं। इन्हे बचाने के लिए जागरूकता जरूरी है। अतः यह प्रयास प्रसंशनीय है।

यह प्रकृति हमारे लिए महत्वपूर्ण है। यह बात हमारे गुणी-जनों और ऋषी-मुनियों ने बहुत पहले ही समझ लिया था। इसी लिए नदियों, वनों, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों आदि को पूजा और आध्यात्म से जोड़ दिया था। ताकि उनका संरक्षण और सम्मान हो। जिन बातों की आलोचनाएं होती थी। उनका महत्व आज स्पष्ट है। अगर हम आज भी अपनी पुरानी संस्कृती को याद रखें , तब हर दिन ही विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस होगा।

आप्रेशन मुस्कान और आप्रेशन स्माइल

मानव तस्करी कोई नया विषय नहीं है। प्राचीन समय से दास खरीदने-बेचने, गुलाम और बँधुआ रखने की प्रथा रही है। पर आज के सभ्य समाज में इन्सानों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार निंदनीय है। अनपढ़, गरीब, गुमशुदा और कमजोर लोगों को अक्सर इस तरह के जाल में फंसाया जाता रहा है।
इसी प्रकार गमशुदा बच्चों के लिए आप्रेशन स्माइल चलाया जा रहा है।
नेपाल के हालिया भूकंप के बाद ऐसी बातों की संभावना बढ़ जाती है। इसे रोकने के लिए आप्रेशन मुस्कान एक जुलाई से शुरू किया जा रहाहै। यह एक सराहनीय प्रयास है। उम्मीद है उत्तर प्रदेश सरकार  यह काम  सुचारु रूप  करेगी।

हमारी टूटती – बिखरती विरासतें( जागरूकता )

विरासतों को संरक्षित किया जाये या नहीं ? यह चर्चा का विषय है। कुछ लोग पुरानी चीजों पर किए जा रही खर्च को व्यर्थ मान सकतें है। पर विरासतों को संरक्षित करनेवाली विभिन्न संस्थाएं इसके लिए प्रयासरत है। यूनेस्को (UNESCO) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (United Nations Educational Scientific and Cultural Organization) अनेक विश्व विरासतों को संरक्षित कर रही है।
कुछ विरासतें प्रकृतिक आपदाओं से नष्ट हो रही है, और कुछ हमारी नादानियों से। युद्ध और आपसी तकरार का आक्रोश निरीह और निर्जीव धरोहरों पर उतारने की नासमझी प्राचीन समय से चला आ

बुद्ध प्रतिमा, साँची स्तूप
बुद्ध प्रतिमा, साँची स्तूप

रहा है। आज भी विभिन्न आतंकी संगठन इस तरह के काम में लगे हैं।
बामियान में बुद्ध के 58 और 38 मीटर ऊँची मूर्तियाँ, 2000 हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता के पलम्यरा के अवशेष जो रेगिस्तान में लगभग 120 एकड़ में फैले है, इराक का हातरा या प्राचीन इराक़ी शहर निमरूद आदि ना जाने कितने धरोहर नष्ट किए जा रहें है।
क्या इस तरह के तोड़-फोड़ को रोका नहीं जाना चाहिए? यह क्षति अपूर्णिया है। ये विरासतें हमारी धरोहर हैं।

चिकेंनकारी – (लखनऊ की नाजुक कशीदाकारी)

यह लखनऊ की जानी-मानी कढ़ाई है। यह मुगक शासकों और नवाबों को बड़ी प्रिय थी। इसे अमीरों की पसंद मानी जाती थी। वास्तव में आज भी जब चिकेंनकारी विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर किया जाता है। तब यह काफी मूल्यवान हो जाता है।

ओरगेंज़ा कपड़े पर बना बारीक  चिकेनकारी
ओरगेंज़ा कपड़े पर बना बारीक चिकेनकारी

किव्दंती– इस कढ़ाई की उत्पत्ति के बारे में अनेक कहानियाँ हैं। ऐसा माना जाता है की मुगल बादशाह जहांगीर की शौकीन और विदुषी पत्नी नूरजहाँ ने इस कढ़ाई की शुरूआत करवाई थी। तब यह प्रायः नफासत और नज़ाकत की पहचान मानी जाती थी। हल्के रंगों के कपड़ों पर शुद्ध धागों से हल्के रंग की नाजुक और बेहद बारीक कढ़ाई की जाती थी। कपड़े भी उत्तम प्रकार के और मूल्यवान होते थे। अतिरिक्त खूबसूरती के लिए सितारे, मोती और दर्पण अलंकार के तौर पर लगाए जाते है।

वर्तमान कशीदाकारी – आज यह लखनऊ की पहचान है। इसकी प्रसिद्धी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी है। आज यह आम जनों के बीच भी लोकप्रिया हो गया है। आज कल यह अन्य सामान्य कपड़ों पर भी बनने लगा है। साथ ही हल्की और सामान्य कढ़ाई भी होने लगा है। जिससे कम मुल्य पर भी ये कपड़े उपलब्ध होने लगा है।

चिकेंनकारी की प्रक्रिया – ऐसा कहा जाता है की इसमें 36 अलग- अलग प्रकार के टांकों का उपयोग होता है। इसमें पहले डिज़ाइन चुना जाता है। फिर उसे कपड़े पर उत्कीर्णन यानि ब्लॉक प्रिंटिंग की सहायता से छापा जाता है। इसके बाद इसे विभिन्न कढ़ाई करने वालों को ये कपड़े धागों के साथ दे दिया जाता है। यह काम आस-पास के अनेकों गाँव में होता है। कढ़ाई पूरी होने पर कपड़े को धोया और पालिश / इस्तरी किया जाता है। तब यह बाज़ार में जाने के लिए तैयार हो जाता है।

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कारीगर – सामान्य और साधारण चिकेंनकारी के कारीगर बहुतायत है। सूफियाना रंगों, बारीक 36 अलग अलग टांकों को मूल्यवान कपड़ों पर बनाने वाले कारीगर बहुत कम हैं। इसलिए आज के समय में इस तरह की कढ़ाई काफी दामी है। विशुद्ध रेशम, शिफॉन, औरगेंजा, नेट, सिल्क मलमल और सूती वस्त्रों पर बने कढ़ाई अनमोल है, पर उन्हे पहन कर नवाबों जैसा और राजसी अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।

#Spellingbee भरतीय बच्चे और स्पेलिंग बी ( समाचार )

यह सम्मान और खुशी की बात है, कि हमारे देश  के बच्चे विदेशों में भी सफलता के परचम लहरा रहें हैं. अमेरिका में होने वाले अंग्रेजी भाषा के प्रतियोगिता  लगातार पिछले आठ वर्षों से भरतीय मूल के बच्चे जीतते आ रहें है. स्पेलिंग बी अमेरिक की  महत्वपूर्ण और मान्यता प्राप्त प्रतियोगिता है. यह प्रत्येक वर्ष आयोजित होती है.

इस से यह  बात स्पष्ट हो जाती है कि  हमारे बच्चों में योग्यता की कमी नहीँ है. सही महौल और उचित शिक्षा मिलने पर वे कहीँ भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं. इस वर्ष 13 वर्षीय वन्या और 14 वर्षीय गोकुल ने यह कठिन प्रतियोगिता जीता है. इन दोनो बच्चों को बधाई.

#MyAirtelApp एयरटेल एप  का जादू ( blog related topic )

मेरे पास एयरटेल का मोबाइल कनेक्शन काफी पहले से है। लगभग छः महीने पहले मैंने अपने पुराने फोन को बदलने का निश्चय किया। बड़े दिनों से एंड्रोएड स्मार्ट  फोन की तमन्ना मेरे दिल में थी। आखिरकार मेरा सपना साकार हुआ। मैंने एक एंड्रोएड फोन खरीद लिया। दो-चार दिन तो मैं नए फोन को समझने और चलाने की उलझन में उलझ गई। मैंने स्मार्ट फोन की बड़ी चर्चा सुनी थी। इसलिए जल्दी जल्दी मैंने इसे सीख लिया।

युजर फ्रेंडली या दोस्ताना एप – तभी मुझे एयरटेल एप की जानकारी मिली। पहले तो मुझे घबराहट हुई। नया-नया फोन, इसमें एप कैसे डाला जाए? थोड़ा ड़र भी लगा। कही एप डालने से कोई परेशानी ना हो जाये। कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर मैंने हिम्मत जुटाई और अपने से इस एप  को फोन में डाउनलोड करने का निश्चय किया।  मैंने एप डालने की कोशिश की। तब पाया यह तो बड़ा आसान है। बड़े आसानी और स्वाभाविता से एप डाऊनलोड हो गया।  एप डालने के बाद लगा मेरे सामने एक नई दुनिया ही खुल गई। यह तो सपनों का संसार है। मेरे अपने फोन की खिड़की से सारी दुनिया नज़र आ रही थी। ढेरो ऑप्शन के साथ एयरटेल एप  मेरे मुट्ठी में था। मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। जिन कामों को करना पहाड़ लगता था। क्या सचमुच घर बैठे हो जाएगा? वह भी इतनी सरलता से ? सच बताऊँ, मुझे विश्वाश नहीं हो रहा था। इस आधे बित्ते के मोबाईल के विंडो यानि खिड़की से झाँकते इस एप में क्या सचमुच इतनी शक्ति है? मेरे मन में खयाल आया – पहले इस्तेमाल करो, फिर विश्वाश ।

एयरटेल एप
एयरटेल एप

अलादीन का चिराग – मैंने सोचना शुरू किया, कहाँ से शुरुआत करूँ? सारे के सारे ऑप्शन बड़े लुभावने लग रहे थे। मन में तरह – तरह के ख्याल आ रहे थे।  इस जलती गर्मी में घर से बाहर निकल कर कुछ भी करने का मन नहीं करता है। अगर सचमुच घर बैठे ये काम हो जाए, तब सचमुच मज़ा आ जायेगा । मैं अभी सोच विचार में लगी थी । तभी एयरटेल का एक आकर्षक ऑफर मेरे फोन पर आया। 14 रुपये के रेचार्ज से मेरे सारे काल 30 पैसे प्रति मिनट हो जाएँगे। मैंने अपने एयरटेल – मनी से यह काम करने की कोशिश की और हैरान रह गई। यह काम पल भर में हो गया। अब मैं एयरटेल – मनी का भरपूर इस्तेमाल करने लगी हूँ। यह मुझे बड़ा सरल और सुविधाजनक लगने लगा है।

अब तो मैं बड़ी सहजता और स्वाभाविता से इसके  इंटरनेट का उपयोग भी करने लगी हूँ। एयरटेल वन टच  इंटरनेट से मैं बड़ी आसानी से सभी से जुड़ा हुआ महसूस करती हूँ। बिना लैपटाप के जब चाहो, जहां चाहो ईमेल देखना हो या व्हाट्सएप से परिवार, मित्रों या बच्चों से बातें करना हो, सब मुट्ठी में होता है। यहाँ तक कि ब्लॉग पढ़ना या पोस्ट करना जैसे काम भी उँगलियों के इशारे से हो जाता है। लगता है जैसे हाथों में अलादीन का चिराग आ गया है।   

वैसे तो ख़रीदारी  महिलाओं का मनपसंद  शगल और शौक होता है। पर बाज़ार की  भीड़भाड़ और मोलतोल से मुझे बड़ी परेशानी मससूस होती है। ऊपर से यह भयंकर गर्मी रहा सहा उत्साह भी ठंडा कर देतीं है। ऐसे में एयरटेल से ख़रीदारी की सुविधा ठंढे – सुहाने बौछार सा लगता है। घर बैठे मन चाही ख़रीदारी करो।  वह भी ढेरो ऑफरों के साथ।  यह  बड़ा अच्छा लगता है। वन स्टॉप शॉप फॉर ऑल कंटेन्ट ने जिंदगी को सरल और सुकून भरा बना दिया है।    

फूलों से बरसते  ऑफ़र– एक बात इस एप की मुझे बड़ी अच्छी लगती है। वह है ढेर सारे ऑफर। लगता है  जैसे ड़ाल से टूट कर  खूबसूरत फूल हथेलियों में आ गिरे  हों। जब मैंने अपना मोबाईल रेचार्ज करवाया तब मुझे कुछ रेस्टोरेन्ट के डिस्काउंट कूपन ऑफर में  मिले। इसी तरह इंटरनेट रीचार्ज के साथ मुझे वाइकिंग म्यूजिक की सुविधा ऑफर में प्राप्त ई।

पारिवार का  मददगार दोस्त – अब मेरे बच्चे और पति सब इस एप को इस्तेमाल करने लगे हैं। मेरे पति मोबाईल रीचार्ज, डीटीएच, और ना जाने कितना सारा काम इस एप के जरिये करने लगे है। बेटियाँ भी ख़रीदारी और इंटरनेट बड़े मज़े से इस्तेमाल करने लगी है। इस से समय और मेहनत दोनों की बचत होती है।

http://www.airtel.in/myairtel.

नेशनल ग्रीन ट्रीब्युनल (महत्वपूर्ण जानकारी )

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अधिनियम 2010 में पर्यावरण के मुद्दों से संबंधित मामलों के शीघ्र निपटाने और संभालने के लिए बना एक विशेष न्यायाधिकरण है। यह भारत की संवैधानिक प्रावधान के तहत बना अधिनियम है। जो भारत के नागरिकों को एक स्वस्थ पर्यावरण उपलब्ध कराना चाहता हैं।

जून 1992 में पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के रियो डी जनेरियो शिखर सम्मेलन में भारत ने भाग लिया। इसके बाद हमारे देश में विभिन्न राज्यों में होनेवाले प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति को नियंत्रित करने के लिए इसकी स्थापना की गई।

यह ट्रीब्युन पर्यावरण सुरक्षा और नदियों को सफाई के लिये सजग है. विशेष कर नदियों और सागर के किनारे स्थित होटलों, रिसॉर्ट्स, शहरों द्वारा नदियों में जानेवाले कचरे और गंदगी को रोकने के लिये प्रयासरत है.

पुरी, टिहरी, कश्मीर का डल झील, लक्ष्यद्वीप, गोआ, महाबलीपुरम, हरीद्वार आदि द्वारा कचरों को नदियों व सागर में प्रवाहित करने पर कठोर प्रतिक्रियाएँ दिखाई है. यह सराहनीय  कदम है.

हमारी विरासतों और बीते समय के पद चिन्हों ने हमें तराशा हैं……( एक विचार )

हम में से ज़्यादातर लोग वर्तमान में जीते हैं। भविष्य के सपने सँजोते और योजनाएँ बनाते हैं। बीते हुए समय को अक्सर भुला देते हैं। हम पुरानी बातों को कम महत्व देते हैं। पर यह गौर करने की बात हैं। हम आज जो भी हैं इसमें सबसे ज्यादा महत्व हमारे बीते समय का है। पर हम सभी शायद ही इस बारे में सोचते हैं। एक और महत्वपूर्ण बात है – बीती बातों से हमें वे सीख मिलती है, जो हमे पुरानी गलतियों को करने से रोकती है।

विरासतें – अक्सर विरासत का मतलब पूर्वजों से प्राप्त मकान, जमीन और दौलत जैसी बातों से जोड़ा जाता है। विरासतों को सिर्फ धन-संपाति या जमीन-जायदाद के रूप में देखना सही नहीं है। इसे जीवन के धरोहर के रूप में देखना चाहिए। यानि पुरानी बातों से सीखना चाहिए। वर्तमान में जीना चाहिए और भविष्य के लिए रचना करने की कोशिश करना चाहिए।

स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड — कभी-कभी कुछ लोग कहतें है वे स्वनिर्मित या सेल्फ-मेड है। बात सही है। पर क्या आज हम जो बने है उसमें हमारी विरासतों का हाथ नहीं है? पुश्त दर पुश्त हम तक बहुत सी बातें, व्यवहार पढ़ाई का प्रभाव हम तक ट्रान्सफर होता है। जिस से हमारे  व्यक्तित्व निर्माण होता है।

विरासतें शक्तिशाली हथियार – हमारी विरासतें ऐसी शक्तिशाली हथियार या औज़ार है । जिस से आगे की जीवन को खूबसूरती से तराशा जा सकता हैं। हमारी विरासतें, धरोहर, परम्पराएँ, संस्कृती, पैतृक प्रभाव इन सब का हम पर असर पड़ता है। जिस से आगे सामाजिक बदलाव और तरक्की लाये जा सकते हैं। हम आज जो हैं और जैसे है, वह व्यक्तित्व इन्ही विरासातों से बना है।

हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि अपने धरोहर या थाती को ठीक-ठीक आगे ले जाएँ। ठीक वैसे जैसे हमें मिला है। हो सके तो इसे चिंतन-मनन और समझदारी से और अच्छा रूप दें। ये विरासतें और थाती हमारे सुनहरे कल का आधार है।

इस लेख पर विचार आमंत्रित है। अपने विचार और सुझाव निसंकोच लिखें।
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कोणार्क मंदिर -चमकते सूर्य और बोलते पत्थरों का काला पैगोड़ा ( यात्रा वृतांत और पौराणिक कथा )

          IMG-20150423-WA0001जब सूर्य या अर्क एक  विशेष समय पर, एक ख़ास कोण से उदित होते हैं।  तब  कोणार्क मंदिर मेँ एक दिव्य दृश्य दिखता है। लगता है जैसे सूर्य देव मंदिर के अंदर जगमगा रहें है। शायद  इसलिए यह  मंदिर कोणार्क कहलाया । यहाँ सूर्य को बिरंचि-नारायण भी  कहा जाता है।  इसका काफी काम काले ग्रेनाईट पत्थरों से हुआ है।  इसलिए इसे काला पैगोड़ा भी कहा जाता है। 

पौराणिक मान्यता रही  है कि सूर्य की किरणों में अनेक रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं विशेष कर त्वचा रोग  के उपचार के लिए प्राचीन काल से सूर्य उपासना प्रचलित था। आज भी छठ पूजा और अन्य सूर्य उपासनाएँ प्रचलित है।

 आज, आधुनिक  विज्ञान ने भी सूर्य के किरणों के महत्व को  स्वीकार किया  है।  किवदंती है कि कृष्ण- पुत्र   साम्ब  कोढ़ग्रस्त    हो गए। तब सांब ने  मित्रवन में चंद्रभागा   नदी और  सागर के  संगम पर कोणार्क में, बारह वर्ष तपस्या की। सूर्य देव ने  प्रसन्न हो कर  सांब के  रोगों का  नाश  किया। 

तब साम्ब  चंद्रभागा  नदी में स्नान करने गए । वहाँ  उन्हें  सूर्यदेव की एक मूर्ति मिली।  मान्यता है कि इस  मूर्ति  के रचनाकर देव शिल्पी   विश्वकर्मा स्वयं  थे। उन्होने  सूर्यदेव के शरीर के तेज़ से   इस मूर्ति का  निर्माण किया  था। साम्ब ने “कोणार्क सूर्य   मंदिर’ बनवा कर इस मूर्ति की वहाँ  स्थापना किया।

यह मंदिर एक  रथ रूप में बना है। जिसे सात घोड़े  खींच  रहें हैं।यह  अद्वितीय सुंदरता और शोभामय शिल्पाकृतियों से परिपूर्ण उत्कृष्ट मंदिर  है। यह  मनमोहक  स्थापत्यकला का उदाहरण है। पत्थर पर जीवंत  भगवानों, देवताओं, गंधर्वों, मानवों, वाद्यकों, प्रेमी युगलों, दरबार की छवियों, शिकार एवं युद्ध के चित्र उकेरे हुए हैं।यह मंदिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है, जिन्हे कामसूत्र  से लिया गया  है।।ऐसा माना जाता है कि भगवान सूर्य सात घोड़ों के रथ पर सवार रहतें हैं। इस मंदिर में इसी कल्पना को मूर्त रूप में उतारा  गया है।

इस मंदिर के निर्माण कला को कलिंग शैली कहा गया है। यह  पूरा मंदिर अर्क या सूर्य के रथ के रूप में बना है। जिसे सात घोड़े खींच रहें हैं। इस मंदिर में  बड़े दिलचस्प तरीके से पहर और महीनों का चित्रण किया गया है। रथ के बारह पहिये/ चक्के या चक्र  लाजवाब नक्कासी से पूर्ण हैं। ये बारह चक्र वर्ष के  बारह महीनों के प्रतीक हैं। इन चक्कों में   आठ अर हैं , जो दिन के  आठ प्रहर के सूचक हैं। आधुनिक घड़ी के उपयोग में आने से पहले तक दिन के समय की पहचान पहर/प्रहर के आधार पर होती थी। आज भी हम दिन के दूसरे प्रहर को आम बोलचाल में दोपहर कहते हैं। इस रथ के पहिए कोणार्क की पहचान बन गए हैं ।

 कोणार्क  मंदिर युनेस्को द्वारा संरक्षित विश्व धरोहर है। यह भारत के उड़ीसा राज्य में, पूरी में स्थित  है। इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर 1236 से 1264 के दौरान निर्मित हुआ है। गंग वंश के राजा नृसिंह देव ने इसका निर्माण  करवाया था। इसके निर्माण में काले  ग्रेनाईट पत्थरों का बहुलता से  उपयोग हुआ है। साथ ही लाल बलुआ पत्थरों का भी इस्तेमाल हुआ है। मान्यता हैं कि इसमे दधिनौती या गुम्बज पर एक विशाल चुम्बक लगा था. जिसकी सहायता से इस के अंदर सूर्य की हीराजटित मूर्ति हवा में लटकी रहती थी. विदेशी लुटेरों ने चुम्बक निकाल लिया, जिस से मंदिर ध्वस्त होने लगा. एक मान्यता यह भी हैं कि इस चुम्बक से समुद्र से गुजरने बाले जहाजों के दिशा यंत्र काम करना बंद कर देते थे.

  आज मंदिर का बहुत भाग ध्वस्त हो चुका है। पर इस खंडित और ध्वस्त  मंदिर के सौंदर्य से अभिभूत हो नोबल पुरस्कार प्राप्त कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कभी कहा था-

        “कोणार्क जहां पत्थरों की भाषा मनुष्य की भाषा से श्रेष्ठतर है।”