सारी सारी रात जागते रहे.
सहर उतर आई आँखों में ,
उगते सूरज की लाली ले कर .
समझ नहीं आया
ये आँखे जलती क्यों हैं?
अधूरी नींद से भरी पलकों से ?
पलकों और आँखों तक
बह आए नमकीन पसीने की बूँदो से ?
या अपने हीं नमकीन आँसुओं की नमी से ?
सिंदूरी लाल आँखें
शाम के सूरज सी लगती है.

सहर – सवेरा ,