ज़िंदगी के रंग – 53

सूरज ङूबने वाला था,

ना जाने क्यों ठिठका ?

अपनी लालिमा के साथ कुछ पल बिता

पलट कर बोला – अँधेरे से ङरना मत ।

यह रौशनी-अधंकार कालचक्र है।

नया सवेरा लेकर

मैं कल फिर आऊँगा !!!!!

 

 

image by Rekha Sahay

16 thoughts on “ज़िंदगी के रंग – 53

    1. पुनः शुक्रिया । वैसे हिंदी में जिंदगी भी चलता है पर नुक्ता लगाने से खूबसूरती बढ़ गई।

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