जिंदगी के रंग (कविता – 5)

जीवन के इंद्रधनुषी सफर में
हजारो रंग नज़र आते है,
परायों को अपना कहनेवाले
अच्छों को बुरा कहने वाले
कहीँ ना कहीँ मिल जाते है

रोज़ सफेद -काले और
सतरंगी जिंदगी नज़र आती है
जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है।

Source: जिंदगी के रंग (कविता – 5)

36 thoughts on “जिंदगी के रंग (कविता – 5)

  1. कही न कही लोग मिल ही जाते हैं ——-ये जिदगी भी अजीब है रोज नए रंग दिखाती है——-सत्य कहा—–इसके राण में ही रंगने में अपनी खुशी है——बढ़िया।

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  2. रोज़ सफेद -काले और
    सतरंगी जिंदगी नज़र आती है
    जिंदगी रोज़ नये रंग दिखाती है।
    #Excellent_lines

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