(यह भारतीयों की एक मार्मिक कहानी है। “कोमगाटा मारू” जापानी जहाज़ में 376 भारतीय यात्री सवार थे। यह जहाज़ 4 अप्रैल 1914 को निकला। ये भारतीय कनाडा सरकार की इजाज़त से वहाँ पहुंचे। पर उन्हे बैरंग लौटा दिया गया। )
सुदूर देशों में ज्ञान बाँटने और व्यवसाय करने,
हम जाते रहें है युगों से।
आज हम फिर, अच्छे जीवन की कामना, गुलामी और
संभावित विश्वयुद्ध के भय से भयभीत।
निकल पड़े अनंत- असीम सागर में,
कोमगाटा मारू जहाज़ पर सवार हो।
चालीस दिनों की कठिन यात्रा से थके हारे,
हम पहुँचे सागर पार अपने मित्र देश।
पर, पनाह नहीं मिला।
वापस लौट पड़े भारतभूमि,
पाँच महीने के आवागमन के बाद
कुछ मित्रो को बीमारी और अथक यात्रा में गवां।
टूटे दिल और कमजोर काया के साथ लौट,
जब सागर से दिखी अपनी मातृभूमि।
दिल में राहत और आँखों में आँसू भर आए।
अश्रु – धूमिल नेत्रों से निहारते रहे पास आती जन्मभूमि – मातृभूमि।
तभी ………………….
गोलियों से स्वागत हुआ हमारा। कुछ बचे कुछ मारे गए।
अंग्रेजों ने देशद्रोही और प्रवासी का ठप्पा लगा ,
अपने हीं देश आने पर, भेज दिया कारागार।
स्वदेश वापसी का यह इनाम क्यों?
छाया- चित्र इन्टरनेट के सौजन्य से।

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