अक़्स !

तराशते रहें ख़्वाबों को,

कतरते रहे अरमानों को.

काटते-छाँटते रहें ख़्वाहिशों को.

जब अक़्स पूरा हुआ,

 मुकम्मल हुईं तमन्नाएँ,

साथ और हाथ छूट चुका था.

सच है …..

सभी को  मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,

किसी को जमीं,

किसी को आसमाँ नहीं मिलता.

 

प्रतिबिंब

ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,

पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.

देखा है हमने.

हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.

तब भी,

कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,

बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं

मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,

भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.

जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,

अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.

भूल

किस से शिकायत करें?
सिर पटका दर-ए-ख़ुदा पर.
ईश्वर के आगे .
कहीं सुनवाई नहीं हुई .
ना जाने कहाँ भूल हुई ?
भूलना चाह कर भी भूल नहीं सकते.
कहते हैं नियति बदली नहीं जा सकती.
पर हमें तो था वहम …..
हाथ पकड़ कर जगा लेने का
वहम, भ्रम और ग़रूर

Painting courtesy- Lily Sahay

Happy Dhanteras!! शुभ धनतेरस !!

मान्यता है कि धनतेरस के दिन ही भगवान धनवंतरि का जन्म  हुआ था।

सागर मंथन से धनवंतरि हाथों में अमृत से भरा हुआ कलश लेकर प्रकट हुए थे।

 धनतेरस के दिन धन के देवता कुबेर और मृत्युदेव यमराज की पूजा की जाती है।

 

forwarded

वक़्त

समय कब कहता है – वह सही है?

शिद्दत से सही वक्त ढूँढना पङता है।

कई बार सही समय ढूँढने में

वक्त हीं फिसल जाता है हाथों से।

 

गुरुर

नजरे झुकाई, हाथों को जोङा

अौर

झुक गये ऊपर वाले की बंदगी में।

पर दुनिया का  गुरुर तो देखो ,

सामने वाले ने

मान लिया अपने को भगवान !