जिंदगी के रंग – 209

गर गुल ना खिले गुलशन में,

मौसम, मृत्तिका….माटी, बीज  में कमी खोजते हैं सब,

ना कि फूलों में ।

पर अजब बात और ख़यालात है हमारे,

कोई  जिंदगी ठोकर से  खिलने ना पाये,

टूट जाए,

मुरझा जाये।

तब लोग उस में हीं  कमी खोजते हैं.

 

चिड़ियों की मीटिंग

अहले सुबह नींद खुली मीठी, गूँजती आवाज़ों से.

देखा बाहर परिंदों की सभा है.

शोर मचाते-बतियाते किसी गम्भीर मुद्दे पर, सभी चिंतित थे

– इन इंसानों को हुआ क्या है?

बड़े शांत हैं? नज़र भी नहीं आते?

कहीं यह तूफ़ान के पहले की शांति तो नहीं?

हाल में पिंजरे से आज़ाद हुए हरियल मिट्ठु तोते ने कहा –

ये सब अपने बनाए कंकरीट के पिंजरों में क़ैद है.

शायद हमारी बद्दुआओं का असर है.