इतना तो मेरा हक़ बनता था!

मालूम है कि ज़िंदगी है एक रंगमंच

और हम सब किरदार।

पर कौन है शेष रह गए कई अनुत्तरित

सवालों के जवाब का ज़िम्मेदार ?

सब जाएँगें ख़ाली कर बस्ती एक दिन।

पर ऐसे बिन बताए जाता है कौन?

बरहम….. आक्रोश, नाराज़गी जाती नहीं।

ज़वाब मिले, इतना तो मेरा हक़ बनता था।

जिँदगी के रंग – 43

जिंदगी की

 यादें भी बङी बेवफा होतीं हैं,

जिन लम्हों पर कोई हक़ नहीं होता,

उन्हें हीं हक़ से याद करते रहतीं हैं,

जीवन के हर लम्हों में उन्हें

अपनेपन से 

शामिल करते रहतीं हैं।