सैलाब

गीले आँखों से बरसते सैलाब को

देख जाती हुई बारिस ने भी

रुक कर साथ देना तय कर लिया है.

तारीखें चुभती है!!

जाना जरूरी था,
तो कम से कम इतनी राहत
इतना अजाब तो दे जाते…
आँखों में सैलाब दे जानेवाले,
कैलेंडर के जिन पन्नों के साथ हमारी जिंदगी अटकी है।
उसमें से कुछ तारीखें तो मिटा जाते ।
ये तारीखें चुभती है।