शाम

चिड़ियों की चहक सहर…सवेरा… ले कर आती है.

 नीड़ को लौटते परिंदे शाम को ख़ुशनुमा बनाते हैं.

ढलते सूरज से रंग उधार लिए सिंदूरी शाम चुपके से ढल जाती.

फिर निकल आता है शाम का सितारा.

पर यादों की वह भीगी शाम उधार हीं रह जाती है,

भीगीं आँखों के साथ.

सूरज ङूबने के बाद

सूरज ङूबने के बाद

क्षितिज़ के ईशान कोण पर

दमकता है एक सितारा…..

शाम का सितारा !

रौशन क़ुतबी सितारा

 ध्रुव तारा…

सूरज डूब जाए तब भी,

अटल और दिव्यमान रहने का देता हुआ संदेश.

जागता रहा चाँद

जागता रहा चाँद सारी रात साथ हमारे.

पूछा हमने – सोने क्यों नहीं जाते?

कहा उसने- जल्दी हीं ढल जाऊँगा.

अभी तो साथ निभाने दो.

फिर सवाल किया चाँद ने –

क्या तपते, रौशन सूरज के साथ ऐसे नज़रें मिला सकोगी?

अपने दर्द-ए-दिल औ राज बाँट सकोगी?

आधा चाँद ने अपनी आधी औ तिरछी मुस्कान के साथ

शीतल चाँदनी छिटका कर कहा -फ़िक्र ना करो,

रात के हमराही हैं हमदोनों.

कितनों के….कितनी हीं जागती रातों का राज़दार हूँ मैं.

सूरज

थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.

अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.

कभी बादलो में घिर जाता है.

फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.

ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.

बस वही सबक़ सीख लेना है.

पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.

यही जीवन का मूल मंत्र है.

सूरज ङूब गया

जीवन की शाम हो चली थी,

थका-हारा सूरज झुका,

थोङा रुका

….गुफ्तगु के इरादे से या

शायद फिर से आने का

वायदा करना चाहता था धरा से।

पर तभी छा गये बीच में काले बादल।

अौर बिना रुके…..

बिना कुछ कहे सूरज ङूब गया,

कभी नहीं वापस आने को।

चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

सितारा

सूरज ङूबने के बाद क्षितिज़ के ईशान कोण पर दिखा एक सितारा……..

 शाम का सितारा, रौशन क़ुतबी सितारा या शायद ध्रुव तारा….

वह हँसा और सामने आ गया बोला –

टूट-टूट कर तो हम भी गिरते, बिखरते हैं.

तब क्या टिमटिमाना…जीना छोड़ दे?

दिव्यमान रहो, दमकते और चमकते रहो हमारी तरह।

.