सुकून

सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,

याद दिलातीं हैं – बचपन की,

बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।

 नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,

पर अब ङूबे हैं  जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।

तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।

अब समझदार माँझी  

कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा

तलाशता है सुकून-ए-साहिल।

 

ठोकर

जीवन में किसी ने जब कभी 

धोखा दिया,

 समझदार बना दिया,

धक्का  दिया ,

तैराक बना दिया।

समयजमाने की ठोकरें     

जीवन  तराश देती है 

 किसी मूर्तिकार की तरह ।