नीलकंठ

जंग लगी कुंजियों से

रिश्तों के सुप्त तालों को

खोलने की कोशिश में

ना जाने कितने नील गरल

निकलते हैं इस सागर से.

इन नील पड़े चोट के निशान

दिखती नही है दुनिया को,

शिव के नीलकंठ की तरह.

पर पीड़ा….दर्द बहुत देती हैं.

महाकाल

एक दिन देखा शिव का चिता, भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से ।

समझ नहीं आया इतना डर क्यों वहां से जहां से यह भभूत आता हैं।

कहते हैं, श्मशान से चिता भस्म लाने की परम्परा थी।

पूरी सृष्टि इसी राख  में परिवर्तित होनी है एक दिन।

एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन होनी है।

वहीं अंत है, जहां शिव बसते हैं।

शायद यही याद दिलाने के लिए शिव सदैव सृष्टि सार,

इसी भस्म को धारण किए रहते हैं।

फिर इस ख़ाक … राख के उद्गम, श्मशान से इतना भय क्यों?

कोलाहल भरी जिंदगी से ज्यादा चैन और शांति तो वहां है।

 

 

भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से – वहाँ उपस्थित होने पर भी यह  पूजन देखा महिलाओं के लिए वर्जित है.

मणिकर्णिका 

      नारी सुलभ कामना से

पर्वती ने चाहा रुद्र के साथ समय बिताना .

शिव की यायावर   – तीनों लोकों  में

घूमते रहने की प्रवृति से परेशान हो  कर ,

काशी के गंगा तट पर ,

मणि के बने  अपने  कर्ण फूल छुपा  ,

उसे ढूँढ़ने पिनाकी को लगा दिया .

वह गंगा घाट आज भी मणिकर्णिका कहलाती है .

कहते है , मोक्ष लालसा से यहाँ अनवरत चिंतायें जलती रहती हैं .

झाँसी की रानी मनु का भी  नाम मणिकर्णिका  था .

पर्वती की मणिकर्णिका सचमुच अनमोल है .


ये शिव के अन्य नाम हैं —  रुद्र, पिनाकी

 

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