आपका दिया, आपको समर्पित!

इतनी भी क्या है शिकायतें?

जहाँ जहाँ आप जातें है।

बातें बनाते और सुनाते हैं।

सब हम तक लौट कर आते हैं।

क्यों सब भूल जातें हैं – दुनिया गोल है।

किसी ने क्या ख़ूब कहा है –

पाने को कुछ नहीं, ले कर जाने को कुछ नहीं ।

फिर  इतनी भी क्या है शिकायतें?

हम किसी का कुछ रखते नहीं।

आपका दिया आपको समर्पित –

त्वदीयं वस्तु तुभ्यमेव समर्पये ।

       

शिकवे

शिकवे-शिकायतों के लिए यह ज़िंदगी छोटी है,

पर क्या करें, जो कोई रुका नहीं सुनने के लिये…….

वैसे, ज़िंदगी में लुत्फ़ इन शिकायतों का भी है –

चंद क़तरे अश्क़,

अधूरी आरज़ू -हसरतें…..

और ना- उम्मीद शिकायतें….

गिले तो होंगे हीं.

अपने को माफ करके तो देखिये Forgive yourself

 

अपने आप से नाराजगी, शिकायतें 

अपने आप से झगङा…..

क्यों हम करते  हैं हर  रोज़?

कभी अपने आप से  प्यार अौर दोस्ती

करके तो देखिये।

अपने को माफ करके तो देखिये……

कितना सुकून मिलेगा।