जिंदगी के रंग -205

जीवन में खुश रहने और  सार्थकता ढूंढने में क्या अंतर हैं? 

क्या दोनों साथ-साथ चल सकतें हैं? 

अर्थपूर्णता…सार्थकता के खोज  में अतीत, वर्तमान और भविष्य शामिल होतें हैं।

इसके लिये सही-गलत सीखना पङता है

 खुशियों  के लिये कोई समय, सही-गलत,  कोई शर्त नही होती।

खुशियाँ अपने अंदर होतौं हैं, किसी से मांगनी नहीं पङती है।

सार्थकता जुड़ा है – कर्तव्य,  नैतिकता से।

सार्थकता और अर्थ  खोजने में कभी-कभी  खुशियाँ  पीछे छूट जाती है।

पर जीवन से संतुष्टि के लिये दोनों जरुरी हैं। 

 

 

 

 

साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी क्या है?

रोग प्रतिरक्षा प्रणाली पर शारीरिक और मानसिक तनाव के नकारात्मक प्रभाव

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साइको +न्यूरो + इम्यूनोलॉजी = साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी (पीएनआई) अध्ययन का एक  नया क्षेत्र है। यह हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) और हमारे प्रतिरक्षा प्रणाली का अध्ययन करता है। हाल के  शोध बताते हैं कि इनमें गहरा संबंध हैं। शारीरिक और भावनात्मक तनाव हमारे प्रतिरक्षा  पर बहुत  प्रभाव डाल सकता हैं।

रोग  से लङने की क्षमता  पर तनाव के खराब प्रभावों पर  बहुत  शोध हुए हैं।  सामान्य परिस्थितियों में हमारा शरीर हारमोन स्राव (साइटोकिन्स) करता है, जो  रोगाणु  से लङने या  ऊतक के मरम्मत में मदद  करता है। शारीरिक या भावनात्मक तनाव में  शरीर कुछ अन्य हार्मोन स्राव करता है। ये हार्मोन विशिष्ट रिसेप्टर्स को बाध्य कर सकते हैं जो प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स के उत्पादन के लिए संकेत देते हैं। जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। ये हमारे शरीर के रोगों से लङने के संतुलन को बाधित करता है। इसके विपरीत, अच्छा मानसिक स्वास्थ्य हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

 {शोध बताते हैं कि – शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तनाव की स्थिती में साइटोकिन्स हारमोन स्राव होता  हैं। साइटोकिन्स एक छोटा प्रोटीन होता है जो कोशिकाओं द्वारा छोड़ा जाता है, विशेषकर  प्रतिरक्षा के लिये। साइटोकिन्स कई प्रकार के होते हैं, लेकिन आमतौर पर जो तनाव से उत्तेजित होते हैं, उन्हें प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स कहा जाता है।) 

तनाव रहित रहें, खुश रहें, स्वस्थ रहें !!

दीवाली अौर दीये !

हमने खुद जल कर उजाला किया.

अमावास्या की अँधेरी रातों में,

 बयार से लङ-झगङ कर…

तुम्हारी ख़ुशियों के लिए सोने सी सुनहरी रोशनी से जगमगाते रहे.

और आज उसी माटी में पड़े हैं…..

उसमें शामिल होने के लिए

जहाँ से जन्म लिया था.

यह थी हमारी एक रात की ज़िंदगी.

क्या तुम अपने को जला कर ख़ुशियाँ बिखेर सकते हो?

कुछ पलों में हीं जिंदगी जी सकते हो?

  सीखना है तो यह सीखो। 

 

 

Image courtesy- Aneesh

जीवन की होड़

जीवन की होड़ में एक बात समझ आई –

हर ओर ….सब लोगों  में योग्यतायें है .

इस दौड़ में शामिल होने

से अच्छा है प्रतिस्पर्धा

अपने आप से रखो ताकि .

सामना बराबर वाले से हो .

जिँदगी के रंग – 43

जिंदगी की

 यादें भी बङी बेवफा होतीं हैं,

जिन लम्हों पर कोई हक़ नहीं होता,

उन्हें हीं हक़ से याद करते रहतीं हैं,

जीवन के हर लम्हों में उन्हें

अपनेपन से 

शामिल करते रहतीं हैं।