लफ़्ज़

लफ़्ज़ों के वजूद को समझो।

दिल में उतरने के लिए और

दिल से उतारने के लिए

कुछ बोले और अबोले लफ़्ज़

हीं काफ़ी हो

 

मोम

मेरे अस्तित्व का, मेरे वजूद का सम्मान करो।

हर बार किसी के बनाए साँचें में ढल जाऊँ,

यह तब मुमकिन है, जब रज़ा हो मेरी।

यह मैं हूँ , जलती और गलती हुई मोम नहीं।

ख़ुद को ख़ुद से

कुछ उलझा उलझा ,

कुछ रूठा रूठा सा है वजूद अपना

ख़ुद को ख़ुद से याद करूँ कैसे ?

करना है ख़ुद को ख़ुद से आज़ाद .

करुँ कैसे ?

बड़ा उलझा प्रश्न है.

कभी कभी उठने वाली कसक,

मन की दर्द , पीड़ा , विरह

किसी को समझाऊँ कैसे ?

अपने से, अपने रूह से बात करूँ कैसे ?