ज़िंदगी के रंग – 197

जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,

लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.

तट के पत्थरों और रेत पर

सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.

पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ

नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,

नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.

सुनहरे रेत में, सोने में ढलते सपने

News – Saudi Arabia’s proposed $500 billion mega-city

 

जहाँ चारो अोर रेत का  समंदर है,

वे भी बिना ङरे सबसे आगे जाने ,

नये हौसले दिखाने का साहस कर रहें हैं,

फिर हम तो सामर्थवान हैं।

युवा शक्ति अौर योग गुरु हैं।

बस सुनहरे सपने देखने अौर

उसे पूरा करने के हौसले की  हीं तो जरुरत है।

 

कैक्टस Cactus

रेत पर, तपते  रेगिस्तान में

खिल आये कैक्टस

ने बिना ङरे

 चटक रंगों को बिखेरा।

किसी ख़ूबसूरत नज़्म या कविता की तरह ……

गर्म बयार अौर

आग उगलते सूरज

ने  नन्हे से कैक्टस के हौसले देख

नज़रें झुका  ली ।

 

रेत के नीचे बहती एक  नदी – कविता 



आँखों की चमक ,

होठों की मुस्कुराहटों ,

तले दबे 

 आँसुओं के  सैलाब ,


और दिल के ग़म 

नज़र आने के लिये 

नज़र भी  पैनी  चाहिये.

 कि 

रेत के नीचे बहती एक  नदी भी  है.

रेत अौर समंदर

समंदर हँसा रेत पर – देखो हमारी गहराई अौ लहराती लहरें,

तुम ना एक बुँद जल थाम सकते हो, ना किसी काम के हो।

रेत बोला —

यह तो तुम्हारा खारापन बोल रहा है,

वरना तुम्हारे सामने – बाहर  अौर अंदर भी हम हीं  हम हैं

— बस रेत हीं रेत !!!

जिंदगी के रंग ( कविता) 8

life

जिंदगी ने ना जाने कितने रंग बदले।

रेगिस्तान  के रेत की तरह

कितने निशां बने अौर मिटे

हर बदलते रंग को देख ,

दिल में तकलिफ हुई।

काश,  जिंदगी इतनी करवटें  ना ले।

पर , फिर समझ आया ।

यही तो है जिंदगी।

 

वक्त -कविता 

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कभी तो.थोड़ा थम जा

ऐ वक्त

साँस लेने दे.

ज़रा सुस्ताने दे.

घड़ी की ये सूईया भी

भागी जा रही हैं

बिना पैरों ,

अपनी दो हाथों के सहारे.

कब मुट्ठी के रेत की

तरह तुम फिसल गये वक्त.

पता ही नहीँ चला.

वह तो आईना था.

जिसने तुम्हारी चुगली कर दी.

अनमोल पल (कविता)

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मुट्ठी में पकडे रेत की तरह ,

ना जाने कब वक्त फिसल गया.

जिंदगी की आपाधापी में.

वर्षों बीत गये जैसे पल भर में.

 पुराने दोस्तों से अचानक 

भेट हो जाती हैं.

तब याद आता हैं ,

दशकों बीत गये , बिना आहट  के.

तब याद आते हैं 

वे सुनहरे – रुपहले दिन.

वे यादें , आज़ भी अनमोल हैं ,

वे साथी आज़ भी अनमोल हैं.

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images from internet.

रेत के कण ( कविता )

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                क्या रेत के कणों को देख कर क्या

                 यह समझ आता है कि कभी ये

              किसी पर्वत की चोटी पर तने अकडे

                 महा भीमकाय चट्टान होंगे
या कभी

           किसी विशाल चट्टान को देख कर मन

              में यह ख्याल  आता है कि समय की

              मार इसे चूर-चूर कर रेत बना देगी?

                                 नहीं न?

              इतना अहंकार भी किस काम का?

             तने रहो, खड़े रहो पर विनम्रता से।

                   क्योंकि यही जीवन चक्र है।

              जो कभी शीर्ष पर ले जाता है और

             अगले पल धूल-धूसरित कर देता है।