मुलाक़ात

ऐसा भी क्या जीना?

पूरी ज़िंदगी साथ गुज़र गई।

पर ना अपने आप से बात हुई,

ना तन की रूह से मुलाक़ात हुई।

हवा पानी

 

 

 

जब सुना था पानी बिकेगा बोतलों में।

सोंचा था कौन ख़रीदेगा ?

प्यास बुझाता दरिया का पानी,

 सांसे महकाती दरख़्तों से गुजरती हवा,

आज  बिक रहे हैं  करोड़ों-अरबों में।

पानी आज शर्म से पानी पानी है।

खामोशी में डूबे बयार की अब शर्माने की बारी है।

  बोतल में बंद हवा-पानी प्राण दायिनी बन गई है।

इनके गुलाम रूह अब आजादी पाएंगे कैसे?

 

ज़हन

अर्श….आसमान में चमकते आफ़ताब की तपिश और

महताब की मोम सी चाँदनी

ज़हन को जज़्बाती बना देते हैं.

सूरज और चाँद की

एक दूसरे को पाने की यह जद्दोजहद,

कभी मिलन  नहीं होगा,

यह जान कर भी एक दूसरे को पाने का

ख़्याल  इनके रूह से जाती क्यों नहीं?

 

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अर्थ – 

अर्श-आसमान।

आफ़ताब- सूरज।

महताब- चाँद।

ज़हन – दिमाग़।

 

जिंदगी के रंग- 193

हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।

कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।

हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।

क्या हम आजाद हैं?

या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?