ज़िंदगी के रंग – 212

ज़िंदगी में लोंग आते हैं सबक़ बन कर।

फ़र्क़ यह है कि किस का असर कैसा है?

 वे तराश कर जातें या तोड़ कर ?

पर तय है एक बात ,

चोट करने वाले भी टूटा करते हैं।

 हथौडिया छेनियाँ भी टूटा करतीं है।

 

 

 

Image – Aneesh

पहचान

लोगों के चेहरे देखते देखते ज़िंदगी कट गई।

चेहरे ना अभी तक नहीं आया।

मेरी बातें सुन आईना हँसा और बोला –

मैं तो युगों-युगों से यही करता आ रहा हूँ।

पर मेरा भी यही हाल है।

लोग रोज़ चेहरे बदलते रहते हैं।

सौ चेहरे गढ़, मुखौटे लगा, रिश्वत देते रहते हैं,

मनचाहा दिखने के लिए!

पल-पल रंग बदलते चेहरे,

चेहरे में चेहरा ढूँढने और पहचानने की कोशिश छोड़ो।

अपने दिल की सुनो,

दूसरों को नहीं अपने आप को देखो।

शाम

चिड़ियों की चहक सहर…सवेरा… ले कर आती है.

 नीड़ को लौटते परिंदे शाम को ख़ुशनुमा बनाते हैं.

ढलते सूरज से रंग उधार लिए सिंदूरी शाम चुपके से ढल जाती.

फिर निकल आता है शाम का सितारा.

पर यादों की वह भीगी शाम उधार हीं रह जाती है,

भीगीं आँखों के साथ.

ज़िंदगी के रंग – 197

जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,

लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.

तट के पत्थरों और रेत पर

सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.

पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ

नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,

नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.

ज़िंदगी के रंग – 194

ज़िंदगी कट गई भागते दौड़ते.

थोड़ा रुककर कर,

ठहर कर देखा – चहचहातीं चिड़ियों को,

ठंड में रिमझिम बरसती बूँदे,

हवा में घुली गुलाबी ठण्ड……

खुशियाँ तो अपने आस-पास हीं बिखरीं हैं,

नज़रिया और महसूस करने के लिए फ़ुर्सत….

वक़्त चाहिए.

ज़िंदगी के रंग – 191

हमसे ना उम्मीद रखो सहारे की.

ख़ुद हीं लड़ रहे हैं नाउम्मीदी से.

वायदा है जिस दिन निकल आए,

पार कर लिया दरिया-ए-नाउम्मीद को.

सबसे बड़े मददगार बनेंगे.

 

जिंदगी के रंग-188

अपने हों, हवा-ए-फिजा, उड़ता धुँआ या धुंध हो।

जिनके रुख का पता हीं ना हो ,

उन्हें परखने की कोशिश बेकार है ।

क्यों नहीं आज़माना  है, 

तब्सिरा….. समिक्षा करनी है अपनी? 

ईमानदारी से झाँकों अपने अंदर,

या मेरे अंदर…… .आईने ने कहा।

सारे जवाब मिल जायेंगें।

ज़िंदगी के रंग- 186

“You have to keep breaking your heart until it opens.”
― Rumi

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चुभते, बेलगाम,  नुकीले आघातों से टूटना,

दस्तुर-ए- ज़िदंगी है। 

पर किसी को तोङना क़सूर है।

दूसरों को तोड़ने की कोशिश

वही करते हैं, जो ख़ुद टूटे रहते हैं.

इसलिये हौसला हारे बिना 

लगे रहना, आगाज-ए- जीत है।

ज़िंदगी के रंग -185

वर्षा सी बरसती,

अर्ध खुली भीगी आँखों के

गीले पलको के चिलमन से

कभी कभी दुनियाइंद्रधनुष सी,

सतरंगी दिखती है.

आँखों के खुलते ही सारे

इंद्रधनुष के रंग बिखर जाते हैं.

ख़्वाबों का पीछा करती

ज़िंदगी कुछ ऐसी हीं होतीं.

ज़िंदगी के रंग -75

कहते है – यह ज़िंदगी बुलबुला है.

पर जीवन के रंगमंच पर

ना तो इसे फूँक मार

अस्तित्व मिटाया जा सकता है

ना नियति के झोंके से

बचाया जा सकता है .

हम सब किसी और की

ऊँगलियों से बँधे,

नियंता के हाथों

की कठपुतलिया हैं.

और सब जानते – समझते भी

ज़िंदगी और मौत का रंग

अंदर तक हिला जाता है……….