महाकाल

एक दिन देखा शिव का चिता, भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से ।

समझ नहीं आया इतना डर क्यों वहां से जहां से यह भभूत आता हैं।

कहते हैं, श्मशान से चिता भस्म लाने की परम्परा थी।

पूरी सृष्टि इसी राख  में परिवर्तित होनी है एक दिन।

एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन होनी है।

वहीं अंत है, जहां शिव बसते हैं।

शायद यही याद दिलाने के लिए शिव सदैव सृष्टि सार,

इसी भस्म को धारण किए रहते हैं।

फिर इस ख़ाक … राख के उद्गम, श्मशान से इतना भय क्यों?

कोलाहल भरी जिंदगी से ज्यादा चैन और शांति तो वहां है।

 

 

भस्मपूजन उज्जैन महाकाल में बंद आंखों से – वहाँ उपस्थित होने पर भी यह  पूजन देखा महिलाओं के लिए वर्जित है.

दिन

अपना आज का दिन बनाने के लिए अक्सर

गुजरे दिन की शामें याद कर लेते हैं।

जिंदगी के रंग- 193

हम कभी क़ैद होते है ख्वाबों, ख्वाहिशों , ख्यालों, अरमानों में।

कभी होते हैं अपने मन अौर यादों के क़ैद में।

हमारी रूह शरीर में क़ैद होती है।

क्या हम आजाद हैं?

या पूरी जिंदगी ही क़ैद की कहानी है?

 

 

गुमान

गुमान था अपनी फोटोग्राफिक स्मृति पर,
जो देखा उसे याद रखने की फोटो स्मृति क़ाबिलीयत पर,
ना भूलने की क्षमता पर,
फिर देखा अपनी ताकत ही अपनी कमजोरी बनते।
अब लड़ रहे हैं अपने आप से
अपनी यादों से, याददाश्त से,
किसी को विदा किए पलों को,
एक दिन, इक तारीख को भूलने की कोशिश में।

बदलाव

उम्र ने बहुत कुछ बदला –

जीवन, अरमान, राहें…….

समय – वक़्त ने भी कसर नहीं छोड़ी –

मौसम बदले, लोग बदले………

मन में यह ख़्याल आता है –

इतना ख़्याल ना करें, इतना याद ना करें किसी को …..

पर आँखे बंद करते –

मन बदल जाता है, ईमान बदल जाते हैं .