काँच की नगरी

टूट कर मुहब्बत करो

या मुहब्बत करके टूटो.

यादों और ख़्वाबों के बीच तकरार चलता रहेगा.

रात और दिन का क़रार बिखरता रहेगा.

कभी आँसू कभी मुस्कुराहट का बाज़ार सजता रहेगा.

यह शीशे… काँच की नगरी है.

टूटना – बिखरना, चुभना तो लगा हीं रहेगा.

यादों के चंदन

 चंदन के साथ रखे थे कुछ

यादें अौ

ख़्वाब !

कुछ ख़्वाब

पूरे हुए,

कुछ अधूरे हैं।

पर संदल की  ख़ुशबू  से भर गये  हैं।

साथ अौर गुलाबी डूबती शाम

गुलाबी डूबती शाम.

थोड़ी गरमाहट लिए हवा में

सागर के खारेपन की ख़ुशबू.

सुनहरे पलों की ….

यादों की आती-जाती लहरें.

नीले, उफनते सागर का किनारा.

ललाट पर उभर आए नमकीन पसीने की बूँदें.

आँखों से रिस आए खारे आँसू और

चेहरे पर सर पटकती लहरों के नमकीन छींटे.

सब नमकीन क्यों?

पहले जब हम यहाँ साथ आए थे.

तब हो ऐसा नहीं लगा था .

क्या दिल ग़मगिन होने पर सब

नमकीन…..खारा सा लगता है?

जिंदगी के रंग- 189

जब जिंदगी से कोई आजाद होता है,

किसी और को यादों की कैद दे जाता है.

सीखना चाह रहे हैं कैद में रहकर आजाद होना।

काँच के चश्मे में कैद आँखों के आँसू ..अश्कों की तरह.

अपने आप को

अपने आप को आईने में ढूँढा,

परछाइयों में अक्सों….

चित्रों में खोजा,

लोगों की भीड़ में ,

किसी की आँखों में खोजा,

यादों में, बातों में खोजा,

भूल गई अपने दिल में झाँकना.

विचारों-यादों के रंग

कोई रंग नहीं

विचारों, यादों का

पानी की तरह .

ना जाने कहाँ से

कभी काले उदास रंग से और

कभी ख़ुशनुमा सतरंगे रंगो से

रंग जातें है सब .

शुभ नव वर्ष Happy New Year

टेढी -मेढी  बल खाती पगङंङी, ऊँची- नीची राहें ,

कभी फूलों  कभी कांटों के बीच,

 तीखे मोड़ भरे  जीवन का  यह  सफ़र

मीठे -खट्टे अनुभव, यादों,  

के  साथ

 एक अौर साल गुज़र  गया

कब …..कैसे ….पता हीं नहीं चला। 

कभी खुशबू, कभी आँसू  साथ निभाते रहे।

पहेली सी है  यह  जिंदगी।

अभिनंदन नये साल का !!! 

मगंलमय,  

नव वर्ष की शुभकानायें !!!!

 

 

 

फिजा में बिखरी खुशबू


फिज़ा
में बिखरी खुशबू खिसकती सरकती 
ना जाने कब 

पास पहुँच कर 

गले में बाँहें डाल 

अतीत की ओर खीँच  ले गई .

किसी के यादों के साये और गुलाबों के बीच ले गई .