चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

अपने जैसा

उखड़ा-उखड़ा नाराज़ मौसम

बिखरी बेचैन हवाएँ

सर पटकती सी .                                                                                                                                              

कभी-कभी अपनी सी लगने लगतीं हैं.

छोटी सी जिंदगी

सुना था जिंदगी के सफ़र में,

ऐसे कई मोङ आते हैं

जहाँ  कोई ना कोई छूट जाता हैं .

यह भी सुना-

छोटी सी है जिंदगानी

उम्र दो-चार रोज़ की मेहमान है .

मौसम रोज बदलते हैं…….

पर ऐसे बिना बोले

कोई  अपना जाता है क्या ?

आंधियाँ

उखड़-उखड़ा मौसम

नाराज़ सी झकझोरती हवाएँ,

ये आँधियाँ आतीं है .

सब कुछ बिखेर जाती हैं.

पर कभी कभी

ये राहें झाड़ बहाङ कर,

सब साफ़ सुथरा

 

बदलाव

उम्र ने बहुत कुछ बदला –

जीवन, अरमान, राहें…….

समय – वक़्त ने भी कसर नहीं छोड़ी –

मौसम बदले, लोग बदले………

मन में यह ख़्याल आता है –

इतना ख़्याल ना करें, इतना याद ना करें किसी को …..

पर आँखे बंद करते –

मन बदल जाता है, ईमान बदल जाते हैं .

 

 

 

 

मौसम अौर लोग

किसी को अपनी आदत बनाना ठीक नहीं,

लोगों को मौसम की तरह बदलते देखा है।

ज़िंदगी के रंग – 44

आज

क्या कुछ ख़ास बात है ?

नज़ारे ख़ूबसूरत लग रहे है,

लोग प्यारे लग रहे है,

मौसम ख़ुशगवार सा है

लगता है ……

शायद आज दिल ख़ुश है।