आज – २२ मार्च, जनता कर्फ़्यू

आज सुबह बॉलकोनी में बैठ कर चिड़ियों की मीठा कलरव सुनाई दिया

आस-पास शोर कोलाहल नहीं.

यह खो जाता था हर दिन हम सब के बनाए शोर में.

आसमान कुछ ज़्यादा नील लगा .

धुआँ-धूल के मटमैलापन से मुक्त .

हवा- फ़िज़ा हल्की और सुहावनी लगी. पेट्रोल-डीज़ल के गंध से आजाद.

दुनिया बड़ी बदली-बदली सहज-सुहावनी, स्वाभाविक लगी.

बड़ी तेज़ी से तरक़्क़ी करने और आगे बढ़ने का बड़ा मोल चुका रहें हैं हम सब,

यह समझ  आया.

मेरे मंदिरों में – कविता 

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मेरे मंदिरों में भी तुम सब

करते हो मोल -तोल.

कभी पुजारी और कभी भक्त बन कर.

बड़े पक्के हो ,

व्यापर करने में.

लेकिन क्या जानते हो ,

अपना अनमोल मोल ?

जो बिना किसी मोल -भाव

मैंने तुम्हें दिया ?

 

 

image from internet and rekha.