आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं….

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं,

हम सब बुनते रहते हैं,

ख़ुशियों भरी ज़िंदगी के अरमान।

हमारी तरह हीं बुनकर पंछी तिनके बुन आशियाना बना,

अपना शहर बसा लेता है.

बहती बयार और समय इन्हें बिखेर देते हैं,

यह  बताने के लिये कि… 

 नश्वर है जीवन यह।

मुसाफिर की तरह चलो। 

यहाँ सिर्फ रह जाते हैं शब्द अौर विचार। 

वे कभी मृत नहीं होते।

जैसे एक बुनकर – कबीर के बुने जीवन के अनश्वर गूढ़ संदेश। 

 

 

बुनकर पंछी- Weaver Bird.

दीवाली अौर दीये !

हमने खुद जल कर उजाला किया.

अमावास्या की अँधेरी रातों में,

 बयार से लङ-झगङ कर…

तुम्हारी ख़ुशियों के लिए सोने सी सुनहरी रोशनी से जगमगाते रहे.

और आज उसी माटी में पड़े हैं…..

उसमें शामिल होने के लिए

जहाँ से जन्म लिया था.

यह थी हमारी एक रात की ज़िंदगी.

क्या तुम अपने को जला कर ख़ुशियाँ बिखेर सकते हो?

कुछ पलों में हीं जिंदगी जी सकते हो?

  सीखना है तो यह सीखो। 

 

 

Image courtesy- Aneesh

धृष्ट चाँद

पूनम का धृष्ट चाँद बिना पूछे,

बादलों के खुले वातायन से

अपनी चाँदनी को बड़े अधिकार से

सागर पर बिखेर गगन में मुस्कुरा पड़ा .

सागर की लहरों पर बिखर चाँदनी

सागर को  अपने पास बुलाने लगी.

लहरें ऊँचाइयों को छूने की कोशिश में

ज्वार बन तट पर सर पटकने लगे .

पर हमेशा की तरह यह मिलन भी

अधूरा रह गया.

थका चाँद पीला पड़ गया .

चाँदनी लुप्त हो गई .

सागर शांत हो गया .

पूर्णिमा की रात बीत चुकी थी .

पूरब से सूरज झाँकने लगा था .

आंधियाँ

उखड़-उखड़ा मौसम

नाराज़ सी झकझोरती हवाएँ,

ये आँधियाँ आतीं है .

सब कुछ बिखेर जाती हैं.

पर कभी कभी

ये राहें झाड़ बहाङ कर,

सब साफ़ सुथरा