कई बार जड़ा नाज़ुक आईने को , 

कभी चाँदी, कभी सोने,

कभी पन्नों,  कभी माणिक में।

पर बदला नहीं इस ने कभी अक्स-ए-हकीकत।

हैरान हैं, इस गज़ब की ईमानदारी से।

ऐसे जमाने में.

जब  बिकते हैं सख्त जां लोग भी  लाचारी में।