दर-ओ-दीवार

दूरियाँ- नज़दीकियाँ तो दिलों के बीच की बातें हैं।

 दीवारों पर इल्ज़ाम क्यों? 

जो खुद चल नहीं सकतीं वे दूसरों की दूरियाँ क्या बढ़ाएँगीं?

अक्सर  दीवारें रोक लेतीं हैं ग़म अौर राज़ सारे अपने तक,

अौर समेटे रहतीं हैं इन्हें  दिलों में अपने।

किलों, महलों, हवेलियों, मकानों, घरों से पूछो……

इनके दिलों में छुपे  हैं कितने राज़, कितनी कहानियाँ।

अगर बोल सकतीं दर-ओ-दीवारें…….

बतातीं दीवार-ए-ज़ुबान से,  सीलन नहीं आँसू हैं ये उसके।

वह तो गनिमत है कि….. 

दीवारों के सिर्फ कान होते हैं ज़ुबान नहीं।

जागता रहा चाँद

जागता रहा चाँद सारी रात साथ हमारे.

पूछा हमने – सोने क्यों नहीं जाते?

कहा उसने- जल्दी हीं ढल जाऊँगा.

अभी तो साथ निभाने दो.

फिर सवाल किया चाँद ने –

क्या तपते, रौशन सूरज के साथ ऐसे नज़रें मिला सकोगी?

अपने दर्द-ए-दिल औ राज बाँट सकोगी?

आधा चाँद ने अपनी आधी औ तिरछी मुस्कान के साथ

शीतल चाँदनी छिटका कर कहा -फ़िक्र ना करो,

रात के हमराही हैं हमदोनों.

कितनों के….कितनी हीं जागती रातों का राज़दार हूँ मैं.