प्रतिबिंब

ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,

पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.

देखा है हमने.

हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.

तब भी,

कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,

बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं

मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,

भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.

जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,

अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.

दिल और आत्मा का दर्द

 

दिलों- दिमाग़ को दर्द जमा करने का कचरादान ना बनाओ.

खुल कर जीने के लिए दर्द को बहने देना ज़रूरी है –

बातों में, लेखन में …..

खुल कर हँसने के लिए खुल कर रोना भी ज़रूरी है,

ताकि दिल और आत्मा का दर्द आँसुओं में बह जाए.