बचपन World Children’s Day – 20 November

वो बचपन, वो बेपरवाह एहसास,

वो मासूमियत और भोलापन,

डूबा सच्चाई की चाशनी में।

तितलियाँ हमजोली लगती,

भँवरें ग़ज़लें सुनाते।

वो पारियों की सच्ची लगती कहानियाँ,

वो बेफ़िक्री की नींद।

ख़ुश थे कल वे पानी में

काग़ज़ की कश्तियाँ तैरा कर।

आज पानी भरे सात सागरों के पार

जा आ कर भी डूबे है ज़िंदगी कि उलझनों में।

एक वो ज़माना था, इक ये ज़माना है।

Happy World Children’s Day – 20 November

काग़ज़ की कश्तियाँ

बारिश में काग़ज़ की कश्तियाँ तैराते बच्चे

कल दुनिया के समंदर में ग़ुम हो जाएँगें या

खुद विशाल सागर बन जाएँगें।

तितलियाँ पकड़ते नन्हे फ़रिश्ते

दुनिया में गुमनाम हो जाएँगे या

अपनी सफ़ल दुनिया सज़ायेगें।

बच्चों का बचपना बनता है उनकी ज़िंदगी।

ये बचपन का लम्हा पल में गुज़र जाएगा।

जैसा आज़ देंगे, कल वे वही बन,

वही लौटाएँगें।

Psychological fact- Childhood Emotional Neglect May Impact in negative ways Now and Later.

सुकून

सागर के दिल पर तिरती- तैरती नावें,

याद दिलातीं हैं – बचपन की,

बारिश अौर अपने हीं लिखे पन्नों से काग़ज़ के बने नाव।

 नहीं भूले कागज़ के नाव बनाना,

पर अब ङूबे हैं  जिंदगी-ए-दरिया के तूफान-ए-भँवर में।

तब भय न था कि गल जायेगी काग़ज की कश्ती।

अब समझदार माँझी  

कश्ती को दरिया के तूफ़ाँ,लहरों से बचा

तलाशता है सुकून-ए-साहिल।

 

#यादें – बचपन का वह साथ

सुहाना  शाम  थी। मैं सोफ़े पर अधलेटी टीवी देख रही थी। दिन भर की भाग – दौड़ के बाद बड़ा अच्छा लगता है आराम से बैठ कर अपना मन पसंद टीवी कार्यक्रम देखना। अगर ऐसे में हाथों में गरमा – गरम चाय का प्याला हो। तब और भी अच्छा लगता है। ऐसे में लगता है कि कोई परेशान ना करे। ना कोई छेड़े। फोन की घंटी भी उकताहट पैदा कर देती है। वह दिन भी ऐसा ही था। मैं बड़े मनोयोग से टीवी देख रही थी।

तभी फोन की आवाज़ आई। शायद कोई मैसेज था। मन में ख्याल आया – बाद में देखूँगी। पर फिर मैंने सोचा कहीं मेरे ब्लॉग की कोई सूचना या वोट तो नहीं है। ब्लॉग लिखना बहुत अच्छा लगता है। पर उसके ज्यादा खुशी होती है उसके बारे में वोट या कमेंट्स पढ़ कर। मैं अपने इस लोभ को रोक नहीं पाई। फोन हाथों में ले कर देखा। मैसेंजर पर किसी का मैसज था। फेसबुक पर भी आमंत्रण था। नाम तो जाना पहचाना था, पर सरनेम कुछ अलग था।

यही विरोधाभास है हमारे यहाँ। लड़कों के नाम तो ज्यों के त्यों रहते है। पर लड़कियों को अपने परिचय में कुछ नया जोड़ना पड़ता है शादी के बाद। मुझे पूरा नाम पढ़ कर ठीक से कुछ याद नहीं आ रहा था। मानव स्वभाव भी बड़ा विचित्र होता है। अक्सर हमें आधी अधूरी कहानियां ज्यादा परेशान करती है। हमारी पूरी कहानी जानने की चाह का फायदा टीवी सीरियल वाले भी उठाते हैं। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। मेरे आधी याद ने मेरा पूरा ध्यान उधर ही खींच लिया। यह किसका मैसेज है? दिमाग में यह बात घूमने लगी।

निर्णय नहीं ले पा रहीं थी। जीत अधूरे टीवी कार्यक्रम की होगी या अधूरी याद की। आखिरकार मैंने फेसबुक देखा। आँखों के आगे लाभग 36 वर्ष पुराने दिन घूमने लगे। यह तो लिली है। हम दोनों ने बचपन का बहुत खूबसूरत समय साथ गुजारा था। हम एक ही कॉलोनी में रहते थे। हमारे घर आमने सामने था। हमारे पारिवारिक संबंध थे। साथ में खेलना कूदना और समय बिताना। हमने ना जाने कितनी होली साथ खेली थीं, और दुर्गा पूजा के कार्यक्रम इकट्ठे मनाये । ढेरो मीठी यादों ने घेर लिया।

मेरे पिता के तबादले के बाद हमलोगों का साथ छूट गया था। हमारी शादियाँ हो गई। हमारे उपनाम बदल गए। परिवार और बच्चों में उलझ कर हमारी जिंदगी तेज़ी से आगे बढ़ गई। किसी जरिये से उसे मेरे बारे में मालूम हुआ था। तभी लिली का फोन आ गया। उसकी आवाज़ में उत्साह और खुशी झलक रही थी। हम बड़े देर तक भूली- बिसरी यादों को बताते, दोहराते रहे।

बचपन का साथ और यादें इतनी मधुर होती है।यह तभी मैंने महसूस किया। सचमुच बड़ा मार्मिक क्षण था वह। आज इतने समय के बाद हमारी बातें हो रहीं थी। जब हमारे बच्चे बड़े हो चुके है। दुनिया बहुत बदल चुकी है। पर बचपन का वह साथ आज भी मन में उल्लास भर देता है।