परिंदे

इन परिंदों की उङान देख,

चहचहाना सुन ,

रश्क होता है।

कितने आज़ाद हैं……

ना बंधन, ना फिक्र  कि …….

कौन सुनेगा ….क्या कहेगा…….

बस है खुली दुनिया अौर आजाद जिंदगी।

बंधन

 

कभी कहीं सुना था –
किसी को बंधनों में बाँधने से अच्छा है, आज़ाद छोङ देना।
अगर अपने हैं ,
अपने आप वापस लौट आएगें।

एक सच्ची बात अौर है –
अगर लौट कर ना आयें, तब भी गम ना करना।
क्योंकि
जगह तो बना कर जा रहें है,
शायद किसी ज्यादा अपने के लिये………..

शादी

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रोज़ के झिकझिक से परेशान ,
झूठी बातों  और धोखे से हैरान
जब भी उसने चाहा निकलना
सबने कहा -सात जन्मों का
बंधन हैं.
तुम्हे निभाना हैं.
पावन सम्बन्ध हैं
तुम्हे निभाना हैं.
पर यह तो सचमुच ऐसा बंधन हैं.
जो सिर्फ उसे निँभाना हैं.
ऐसा क्यों ?
काश ये बातें दोनों को कही जाती.

 

 

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