ए’तिबार

हम थे ख़फ़ा ख़फ़ा उन से।

और बेरुख़ी से वो चल दिए,

वहाँ जहाँ हम मना ना सके।

वफ़ा-जफ़ा, वफ़ाई-बेवफ़ाई,

के ग़ज़ब हैं अफ़साने।

ग़ज़ब हैं फ़साने।

हमें ऐतबार हीं नहीं रहा ज़माने पर।

समझो जीना आ गया

फ़साने लिखें, जवाब ना आए।

अनदेखा-अनसुना किया जाए।

ऐसी बेरुख़ी की क्या शिकायतें?

सुकून है तब, संभल कर निकल जायें

जब क़रीब से कमजोर- बिखरती इमारतों के।

तब समझो ज़िंदगी जीना आ गया।

TopicByYourQuote