कन्यादान महादान – कई प्रश्न

कन्यादान के समय कहा जाने वाला मंत्र –
अद्येति………नामाहं………नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि – अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ……… नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पत्नीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे। वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।

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अद्येति नामाहं नाम्नीम् इमां कन्यां……तुभ्यं अहं सम्प्रददे।।

कन्या के हाथ वर के हाथों में सौंपनें के लिये,

ना जाने क्यों बनी यह परम्परा?

कन्या को दान क्यों करें?

जन्म… पालन-पोषण कर कन्या किसी और को क्यों दें ?

विवाह के बाद अपनी हीं क्यों ना रहे?

कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा से चले? 

अगर पिता ना रहें ता माँ का कन्या दान का हक भी चला जाता है।

गर यह महादान है, तब मददगार

 ता-उम्र अपने एहसान तले क्यों हैं दबाते?

है किसी के पास इनका सही, अर्थपूर्ण व तार्किक जवाब?

जिंदगी के आईने में कई बेहद अपनों के कटु व्यवहार

की परछाईं ने बाध्य कर दिया प्रश्नों  के लिये?

वरना तो बने बनाये स्टीरियोटाइप जिंदगी

 जीते हीं रहते हैं हम सब।

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जिंदगी के रंग -207

प्रश्न  बङा कठिन है।

 दार्शनिक भी है, तात्त्विक भी है।

पुराना  है,  शाश्वत-सनातन भी  है।

तन अौर आत्मा या कहो रुह और जिस्म !!

इनका  रिश्ता है  उम्रभर का।

खोज रहें हैं  पायें कैसे?

 दोनों को एक दूसरे से मिलायें कैसे?

कहतें हैं दोनों  साथ  हैं।

फिर भी खोज रहें हैं – मैं शरीर हूँ या आत्मा? 

चिंतन-मनन से गांठें खोलने की कोशिश में,

 अौर उलझने बढ़ जातीं हैं।

मिले उत्तर अौर राहें, तब बताना।

 पूरे जीवन साथ-साथ हैं,

पर क्यों मुश्किल है ढूंढ़ पाना ?

 

 

फर्क

एक प्रश्न अक्सर दिलो-दिमाग में घूमता है.

एक शिशु जहाँ जन्म लेता है। जैसा उसका पालन पोषण होता है।

वहाँ से उसके धर्म की शुरुआत होती है।

जो उसे स्वयं भी मालूम नहीं।

तब कृष्ण के नृत्य – ‘रासलीला’,

सूफी दरवेशओं के नृत्य ‘समा’ में क्यों फर्क करते हैं हम?

ध्यान बुद्ध ने बताया हो या

कुंडलिनी जागरण का ज्ञान उपनिषदों से मिला हो।

क्या फर्क है? और क्यों फर्क है?

जिंदगी के रंग – 29

प्रश्न करते -करते जिंदगी से,

थक कर जब उत्तर की आस छोङ दी…..

तब  वह जवाब अपने आप देने लगी।

दूसरों को देखना छोङ, खुद को देखो…..

मुक्त कर दो अपने आप को –

गलती, प्यार, गुस्सा विश्वासघात, हार-जीत से………….