साथ अौर गुलाबी डूबती शाम

गुलाबी डूबती शाम.

थोड़ी गरमाहट लिए हवा में

सागर के खारेपन की ख़ुशबू.

सुनहरे पलों की ….

यादों की आती-जाती लहरें.

नीले, उफनते सागर का किनारा.

ललाट पर उभर आए नमकीन पसीने की बूँदें.

आँखों से रिस आए खारे आँसू और

चेहरे पर सर पटकती लहरों के नमकीन छींटे.

सब नमकीन क्यों?

पहले जब हम यहाँ साथ आए थे.

तब हो ऐसा नहीं लगा था .

क्या दिल ग़मगिन होने पर सब

नमकीन…..खारा सा लगता है?

काल चक्र

जिंदगी के हसीन  पलों को

कितनी  भी बार कहो – थम जा !!

पर यह कब रुकता है?

पर दर्द भरे पलों का

बुलाअो या ना बुलाअो,

लगता है यह खिंचता हीं चला जा रहा है………

पता नहीं समय का खेल है या मन का?

पर इतना तो तय है –

वक्त बदलता रहता है………….

यह काल चक्र चलता रहता है।

जैसा भी समय हो,    बीत हीं जाता है ……….