ज़िंदगी के रंग -211

 

 

 

 

बादलों और धूप को लड़ते देखा ।

रात की ख़ुशबू में,

खुली आँखों और सपनों को झगड़ते देखा।

फ़ूल और झड़ती पंखुड़ियों को,

हवा के झोंकों से ठहरने कहते देखा।

अजीब रुत है।

हर कोई क्यों दूसरे से नाख़ुश है?

चोट का दर्द

कहते हैं चोट का दर्द टीसता है

सर्द मौसम में.

पर सच यह है कि

सर्द मौसम की गुनगुनी धूप,

बरसाती सूरज की लुकाछिपी की गरमाहट

या जेठ की तपती गर्मी ओढ़ने पर भी

कुछ दर्द बेचैन कर जाती हैं.

दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल कर

कभी कभी ही राहत मिलती है.

बता देना

भोर हो जाय, धूप निकल आए
तब बता देना. जागती आँखों के
ख़्वाबों.. सपनों से निकल
कर बाहर आ जाएँगे.

Painting courtesy- Lily Sahay

धूप मायूस लौट जाती है….

ग़ज़ल: बशीर बद्र

खुद को इतना भी मत बचाया कर,

बारिशें हो तो भीग जाया कर.

चाँद लाकर कोई नहीं देगा,

अपने चेहरे से जगमगाया कर.

दर्द हीरा है, दर्द मोती है,

दर्द आँखों से मत बहाया कर.

काम ले कुछ हसीन होंठो से,

बातों-बातों में मुस्कुराया कर.

धूप मायूस लौट जाती है,

छत पे किसी बहाने आया कर.

कौन कहता है दिल मिलाने को,

कम-से-कम हाथ तो मिलाया कर.