दरिया पर बरसते बादल !!

दोनों ने एक दूसरे को देखा ग़ौर से,

फिर दरिया पर बरसते बादल से पूछा

दरिया ने –

मुझे मेरा दिया हीं लौटा रहे हो?

या अपने राज मेरे कानों में गुनगुना रहे हो …

क्या अपने दिल की बातें मुझे सुना रहे हो?

 

दूर कहाँ ??

यह कविता ब्लॉगर दोस्त निमिष की अोर से सभार मेरे लिये।

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दूर कहाँ ??

तुम तो मेरे सबसे करीब हो

विकट से विकट क्षणों में सबसे निकट हो

हाँ , अब तुम मेरी निकटता पर संशय कर सकते

किसी तीसरे का दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकते

अनुपात , क्षेत्रफल , वेग आदि गणितीय दूरी माप सकते

एक-दूजे की नजदीकियों पर प्रश्नचिन्ह लग सकते

पर सत्य बड़ा सात्विक सरल है !!

मेरे सम्मुख खड़ा सजीव व्यक्ति भी मुझसे कोसों दूर है

तन-मन , तम-ताप , उत्सव-उल्लास हर जगह तुम साथ , मेरे करीब हो

शायद इसीलिये तुम 

ब्रम्हाण्ड के दूसरे सिरे से भी साफ साफ नजर आ रही हो….

साफ साफ नजर आ रही हो….

 

Nimish (मेरी एक कविता आप दोनों के लिए)

जेलोटोलॉजी या हँसी का विज्ञान

क्या आप जानते हैं, हँसी का मनोविज्ञान या विज्ञान होता है। हँसी के  शरीर पर होने वाले प्रभाव को ‘जेलोटोलॉजी’ कहते हैं।

क्या आपने कभी गौर किया है, हँसी संक्रामक या इनफेक्शंस होती है। एक दूसरे को हँसते देखकर ज्यादा हँसी आती है। बच्चे सबसे अधिक हँसते हैं और महिलाएं पुरुषों से अधिक हँसती हैं। हम सभी बोलने से पहले अपने आप हँसना सीखते हैं। दिलचस्प बात है कि हँसने की भाषा नहीं होती है। हँसी खून के बहाव को बढ़ाती है। हम सब लगभग एक तरह से हँसते हैं।

मजे की बात है कि जब हम हँसते हैं, साथ में गुस्सा नहीं कर सकते । हँसी तनाव कम करती है। हँसी काफी कैलोरी भी जलाती है। हँसी एक अच्छा व्यायाम है। आजकल हँसी थेरेपी, योग और ध्यान द्वारा उपचार भी किया जाता है। डायबिटीज, रक्त प्रवाह, इम्यून सिस्टम, एंग्जायटी, तनाव कम करने, नींद, दिल के उपचार में यह फायदेमंद साबित हुआ हैं। हँसी स्वाभिक तौर पर दर्दनिवारक या पेनकिलर का काम भी करती है।

हमेशा हँसते- हँसाते रहें! खुश रहें! सुरक्षित रहें!

 

 

जीवन के रंग – 42

हम सभी के पास

अपनी -अपनी कहानियाँ हैं…..

हम सब किसी ना किसी दौर से गुजरें हैं।

प्यार, नफरत, पसंद, नापसंद,

पछतावा दर्द , दुःख,  खुशी……

जो शायद दूसरे ना समझें।

यह सब तो जीवन के रंग हैं।

जो हमें तोङने के लिये नहीं

जोङने के लिये होते हैं।

रंग बदलता सूरज

सुबह का ऊगता सूरज,

नीलम से नीले आकाश में,

लगता है जैसे गहरे लाल रंग का माणिक…..रुबी…. हो,

अंगूठी में जङे नगीने की तरह।  

दूसरे पहर में विषमकोण में  कटे हीरे

की तरह आँखों को चौंधियाने लगता है ।

सफेद मोती से दमकते चाँद के आगमन की आगाज़ से

शाम, पश्चिम में अस्त होता रवि रंग बदल फिर

पोखराज – मूंगे के पीले-नारंगी आभा से

रंग देता है सारा आकाश।

रंग बदलते सूरज

की रंगीन रश्मियाँ धरा को चूमती

पन्ने सी हरियाली से 

  समृद्ध करती हैं…

 

image courtesy  google.