ज़िंदगी के रंग – 229

ख़ुशियों के खोज़ में

गुज़रती जा रही है ज़िंदगी।

कितनी गुजारी यादों में

कितनी कल्पना में ?

है क्या हिसाब?

ग़र आधी ज़िंदगी गुज़ारी

अतीत के साये में

और भविष्य की सोंच में।

फिर कैसे मिलेगी ख़ुशियाँ ?

और कहते है –

चार दिनों की है ज़िंदगी,

चार दिनों की है चाँदनी ।

Wandering mind not a happy mind ( A research result)

Harvard psychologists Matthew A. Killingsworth and Daniel T. Gilbert used a special “track your happiness” iPhone app to gather research. The results: We spend at least half our time thinking about something other than our immediate surroundings, and most of this daydreaming doesn’t make us happy.

About 47% of waking hours spent thinking about what isn’t going on.

https://news.harvard.edu/gazette/story/2010/11/wandering-mind-not-a-happy-mind/

नीड़

पीले पड़ कर झड़ेंगे

या कभी तेज़ हवा का

कोई झोंका ले जाएगा,

मालूम नहीं।

पत्ते सी है चार दिनों

की ज़िंदगी।

पतझड़ आना हीं है।

फिर भी क्या

तिलस्म है ज़िंदगी ।

सब जान कर भी

नीड़ सजाना हीं है।

ज़िंदगी के रंग – 224

ज़िंदगी के सफ़र में

अब जहाँ आ गए हैं।

बातें अब हम छुपाते नहीं।

लोगों के सिखाए

अदब के लिए,

अपनी ख्वाहिशें दबाते नहीं।

नक़ली सहानुभूति

दिखाने वालों से घबराते नहीं।

कड़वी बोली अब डराती नहीं।

गुनगुनी धूप

मुस्कुराना सिखाती है।

ख़ुद ज़िंदगी खुल कर

जीना सीखती है।

मिथ्यारहित सत्य

मिथ्यारहित सत्य

चाँद को चाँद कह दिया,

ख़फ़ा हो गई दुनिया ।

जब सच का आईना

सामने आया।

सौ-सौ झूठों का

क़ाफ़िला सजा दिया।

ना खुद से ना खुदा से

बोलना सच।

और कहते हैं जीवन का

अंतिम पड़ाव है सच ….

….. मिथ्यारहित सत्य।

तहरीर

तहरीर

कभी ज़िंदगी की हर

लहर डराती थीं।

लगता था बहा ले जाएँगी

अपनी रवानी में।

एक दिन दरिया

कानों में फुसफुसाया –

मैं तो दरिया हूँ ।

कभी कभी ज़िंदगी

समुंदर लगेगी।

पर डरो नहीं।

ज़िंदगी की तहरीरों….

लिखावट को पढ़ना सीखो लो।

समय पर, अपने आप पर

भरोसा करना सीख लो।

अपने आप से प्यार

करना सीख लो।

मज़बूत बनाना सीख लो।

हर दरिया समुंदर में गिरता है,

सागर दरिया में नहीं।

दरिया की बातें सुन,

ज़िंदगी की दरिया में

तैरना सीख रहें हैं।

अब गोते लगा कर डूबते

नहीं, उभर जातें हैं ।

अब लोग परेशान है –

यह अक्स किस का है?

क्यों इतनी रौशनी है

पानी में ….

इनकी ज़िंदगानी में।

पल-पल

अभी का पल,

अगले पल मृत हो,

यादें बन जाता है।

इसलिए मनपसंद तरीक़े से,

मनपसंद लोगों के साथ

पल-समय बिताओ।

ताकि हर पल

मीठी और सुनहरी

यादों का ख़ज़ाना

बन जाए।

तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं !!!!

ऊपर वाले ने दुनिया बनाते-बनाते, उस में थोड़ा राग-रंग डालना चाहा .

बड़े जतन से रंग-बिरंगी, ढेरों रचनाएँ बनाईं.

फिर कला, नृत्य भरे एक ख़ूबसूरत, सौंदर्य बोध वाले मोर को भी रच डाला.

धरा की हरियाली, रिमझिम फुहारें देख मगन मोर नृत्य में डूब गया.

काले कागों….कौओं को बड़ा नागवार गुज़रा यह नया खग .

उन जैसा था, पर बड़ा अलग था.

कागों ने ऊपर वाले को आवाज़ें दी?

यह क्या भेज दिया हमारे बीच? इसकी क्या ज़रूरत थी?

बारिश ना हो तो यह बीमार हो जाता है, नाच बंद कर देता है।

 बस इधर उधर घुमाता अौ चारा चुंगता है.

वह तो तुम सब भी करते हो – उत्तर मिला.

कागों ने कोलाहकल मचाया – नहीं-नहीं, चाहिये।

जहाँ से यह आया है वहीं भेज दो. यहाँ इसकी जगह नहीं है.

तभी काक शिशुअों ने गिरे मयूर पंखों को लगा नृत्य करने का प्रयास किया.

कागों ने काकदृष्टि से एक-दूसरे को देखा अौर बोले –

देखो हमारे बच्चे कुछ कम हैं क्या?

दुनिया के रचयिता मुस्कुराए और बोले –

तुम सब तो स्वयं भगवान बन बैठे हो.

तुम्हें शायद मेरी भी ज़रूरत नहीं.

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#SushantSinghRajput,

#BollywoodNepotism

जिंदगी के रंग – 208

दुनिया में होङ लगी है आगे जाने की…

किसी भी तरह सबसे आगे जाने की। 

कोई ना कोई तो आगे होगा हीं।  

हम आज जहाँ हैं,

वहाँ पहले कोई अौर होगा….. उससे भी पहले कोई अौर।

ज़िंदगी सीधी नहीं एक सर्कल में चलती है। 

जैसे यह दुनिया गोल है।

ज़िंदगी का यह अरमान, ख़्वाब  –

सबसे आगे रहने का, सबसे आगे बढ़ने का……

क्या इस होड़ से अच्छा नहीं  है –

सबसे अच्छा करने का।

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Image courtesy- google.

मानव माइग्रेशन #LockdownIndianMigrants

ग्रेट वाइल्डबीस्ट माइग्रेशन – हर साल अफ्रीका में आश्चर्य जनक दृश्य दिखता है। तंजानिया के सेरेन्गेटी और केन्या के मसाई मारा में भोजन के लिये लाखों जानवरों का महा प्रवास।

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देखा था पशुअों का माइग्रेशन

केन्या, अफ्रिका के जंगलों में।

एक हीं दिशा में,

स्कूल के बच्चों जैसे अनुशासित और अनंत लंबी पंक्तियों में लयबद्ध दौङते,

भागते वाइल्डबीस्ट और ज़ेबरा के झुंङों को।

नदियों मे मगरमच्छों, धरा पर शेरों के शिकार बनते,

मैदान, नदीनाले पार करतेक्रूर मौत से बचतेबचाते।

अौर सुना था…..

 बसंत आने के साथ होता है दुनिया भर में पक्षियों का माइग्रेशन।

पंखों के उड़ान की अद्भुत शक्ति के साथ

अपने घरों को लौटते हैं

  आर्कटिक टर्न पक्षीचमगादड़व्हेल, सामन मछलियां, तितलियाँ पेंगुइन……

 इन विश्व यात्रियों  की महा यात्रा युगों-युगों से

ऋतु परिवर्तन के साथ नियमित चली आ रही है।

यह प्रकृति का विधान है।

लेकिन देखा है पहली बार मानव-माइग्रेशन।

भूखे-प्यासे जलती-तपती धूप में जलते अौ चलते लोग,

अपने घरों की अोर………

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस International Workers’ Day 1 May

अभी मीलों है जाना,

बस चलते जाना है.

भूखेप्यासे चलते जाना है.

पहुँच गए गाँव तब भी सवाल वही है

बिन रोज़गार अब खाएंगे कैसे?

हमारी तो शायद गिनती हीं नहीं हैं.

अगर मर गए कोरोना से तब हम गिनती में तो होंगे.

 

 

International Workers’ Day, also known as Workers’ Day or Labour Day in some countries and often referred to as May Day.

हर साल 1 मई को दुनिया भर में “ अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस“, श्रम दिवस या मई दिवस (International Labour Day) मनाया जाता है। इसे पहली बार 1 मई 1886 को मनाया गया था। भारत में इसे सबसे पहले 1 मई 1923 को मनाया गया था।