किसका दर्द बड़ा ?

हवा में लहराती,

दुनिया रौशन करने की ख़ुशी से नाचती सुनहरी,

लाल नारंगी लौ क्या जाने,

बाती के जलने का दर्द।

जलती बाती क्या जाने गर्म-तपते तेल की जलन?

ना लौ, ना बाती, ना तेल जाने

दीये के एक रात की कहानी।

जल-तप दूसरों को रौशन करती,

अपने तले हीं अंधकार में डूबा छोड़।

पता नहीं किसका दर्द बड़ा ?

पर सब जल-तप करते रहते हैं रौशन राहें।

दीया

दीया

हर दीया की होती है,

अपनी कहानी।

कभी जलता है दीवाली में,

कभी दहलीज़ पर है जलता,

गुजरे हुए की याद का दीया

या चराग़ हो महफ़िल का

या हो मंदिर का।

हवा का हर झोंका डराता है, काँपते लहराते एक रात जलना और ख़त्म हो जाना,

है इनकी ज़िंदगी।

फिर भी रोशन कर जाते है जहाँ।

दिवाली में दीये

किसी ने पूछा –

दिवाली में दीये तो जला सकतें हैं ना?

ग्लोबल वार्मिंग की गरमाहट

तो नहीं बढ़ जायेगी……

नन्हा दीया हँस पङा।

अपने दोस्तों को देख बोला –

देखो इन्हें जरा…..

सारी कायनात  अपनी गलतियों से जलाने वाले

हमारी बातें कर रहें हैं।

जैसे सारी गलती हमारी है।