साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी क्या है?

रोग प्रतिरक्षा प्रणाली पर शारीरिक और मानसिक तनाव के नकारात्मक प्रभाव

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साइको +न्यूरो + इम्यूनोलॉजी = साइकोन्यूरोइम्यूनोलॉजी (पीएनआई) अध्ययन का एक  नया क्षेत्र है। यह हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) और हमारे प्रतिरक्षा प्रणाली का अध्ययन करता है। हाल के  शोध बताते हैं कि इनमें गहरा संबंध हैं। शारीरिक और भावनात्मक तनाव हमारे प्रतिरक्षा  पर बहुत  प्रभाव डाल सकता हैं।

रोग  से लङने की क्षमता  पर तनाव के खराब प्रभावों पर  बहुत  शोध हुए हैं।  सामान्य परिस्थितियों में हमारा शरीर हारमोन स्राव (साइटोकिन्स) करता है, जो  रोगाणु  से लङने या  ऊतक के मरम्मत में मदद  करता है। शारीरिक या भावनात्मक तनाव में  शरीर कुछ अन्य हार्मोन स्राव करता है। ये हार्मोन विशिष्ट रिसेप्टर्स को बाध्य कर सकते हैं जो प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स के उत्पादन के लिए संकेत देते हैं। जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। ये हमारे शरीर के रोगों से लङने के संतुलन को बाधित करता है। इसके विपरीत, अच्छा मानसिक स्वास्थ्य हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

 {शोध बताते हैं कि – शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तनाव की स्थिती में साइटोकिन्स हारमोन स्राव होता  हैं। साइटोकिन्स एक छोटा प्रोटीन होता है जो कोशिकाओं द्वारा छोड़ा जाता है, विशेषकर  प्रतिरक्षा के लिये। साइटोकिन्स कई प्रकार के होते हैं, लेकिन आमतौर पर जो तनाव से उत्तेजित होते हैं, उन्हें प्रो-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स कहा जाता है।) 

तनाव रहित रहें, खुश रहें, स्वस्थ रहें !!

जेलोटोलॉजी या हँसी का विज्ञान

क्या आप जानते हैं, हँसी का मनोविज्ञान या विज्ञान होता है। हँसी के  शरीर पर होने वाले प्रभाव को ‘जेलोटोलॉजी’ कहते हैं।

क्या आपने कभी गौर किया है, हँसी संक्रामक या इनफेक्शंस होती है। एक दूसरे को हँसते देखकर ज्यादा हँसी आती है। बच्चे सबसे अधिक हँसते हैं और महिलाएं पुरुषों से अधिक हँसती हैं। हम सभी बोलने से पहले अपने आप हँसना सीखते हैं। दिलचस्प बात है कि हँसने की भाषा नहीं होती है। हँसी खून के बहाव को बढ़ाती है। हम सब लगभग एक तरह से हँसते हैं।

मजे की बात है कि जब हम हँसते हैं, साथ में गुस्सा नहीं कर सकते । हँसी तनाव कम करती है। हँसी काफी कैलोरी भी जलाती है। हँसी एक अच्छा व्यायाम है। आजकल हँसी थेरेपी, योग और ध्यान द्वारा उपचार भी किया जाता है। डायबिटीज, रक्त प्रवाह, इम्यून सिस्टम, एंग्जायटी, तनाव कम करने, नींद, दिल के उपचार में यह फायदेमंद साबित हुआ हैं। हँसी स्वाभिक तौर पर दर्दनिवारक या पेनकिलर का काम भी करती है।

हमेशा हँसते- हँसाते रहें! खुश रहें! सुरक्षित रहें!

 

 

सतह का तनाव

पानी के क़तरे में चींटी को देखा क़ैद,

सतह तनाव को ना तोड़ पाने से,

एक बड़ी सी जल बूँद के अंदर.

ऐसे हीं क़ैद हो जातें है,

हम भी यादों के क़ैद में.

लगता है, दुनिया में हो कर भी नहीं हैं

और कभी नहीं तोड़ पाएँगे

इस कमज़ोर पारदर्शी बुलबुले के क़ैद को….

सतह तनाव- surface tension

बर्न-आउट ( एक सामान्य मनोवैज्ञानिक समस्या )

burn

बर्न-आउट क्या है ?

ज़िंदगी की भागम-भाग, तनाव, काम की अधिकता अक्सर हमे शारीरिक और मानसिक रूप से थका देती है। जब यह थकान और परेशानी काफी ऊंचे स्तर तक चला जाता है तब ऐसा लगने लगता है जैसे जिंदगी की सामान्य समस्याओ को भी सुलझाना कठिन हो गया है। बर्न-आउट मानसिक या शारीरिक कारणो से हो सकता है। यह लंबे दवाब तथा थकान का परिणाम होता है।बर्न-आउट कार्य-संबंधी या व्यक्तिगत या दोनों कारणो से हो सकता है। ऐसे में मानसिक तनाव व स्ट्रैस बढ़ जाता है। स्वभाव में चिड़चिड़Iपन बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने को ऊर्जा-विहीन, असहाय व दुविधाग्रस्त महसूस करने लगता है।

बर्न-आउट कैसे पहचाने ?
ऐसे मे नकारात्मक सोच ज्यादा बढ़ जाती है। आत्मविश्वास व प्रेरणा मे कमी , अकेलापन, आक्रोश, नशे की लत, जिम्मेदारियो से भागने जैसे व्यवहार बढ़ जाते है। ऐसा व्यक्ति अपना फ्रस्टेशन दूसरों पर उतारने लगता है। ऐसे मे व्यक्ति हमेशा थका-थका व बीमार महसूस करता है। लगातार सिर और मांसपेशिओ मे दर्द, भूख व नींद मे कमी होने लगती है। अपने कार्य मे रुचि मे कमी, हमेशा असफलता का डर, अपना हर दिन बेकार लगने लगता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों के साथ जरूरत से ज्यादा कठोर, असहनशील और चिड़चिड़ा हो जाता  है। गैस्ट्रिक व ब्लड-प्रेशर का उतार-चढ़ाओ असामान्य हो जा सकता है।
ऐसे परिवर्तनो का मतलब है कि अपने शारीरिक व मानसिक कार्य भार को सही तरीके से संभालने की जरूरत है। अगर संभव है तो कार्य-भार को कम कर देना चाहिए। साथ ही अपने लाइफ-स्टाइल को संयमित करना कहिए। अपनी आवश्यकताओ तथा समस्याओं को समझ कर उनका ध्यान रखना चाहिए।

समाधान-
ऐसी समस्याए अक्सर काम को लत (वर्कहोलिक) बना लेने वाले लोगों में ज्यादा पाया जाता है। इसलिए काम के साथ-साथ मनोरंजन, रचनात्मकता, मित्रों और परिवार के साथ समय बिताना भी जरूरी है। जीवन की खुशिया मानसिक तनाव काम करती है। हर काम का ध्येय सिर्फ जीत-हार, जल्दीबाजी या लक्ष्य-प्राप्ति नहीं रखना चाहिए। सकारात्मक सोच और दूसरों को समझने की कोशिश भी आवश्यक है। जिंदगी की परेशानियों  और समस्याओं  को सही नजरिए से समझना भी जरूरी है। समस्याओं  से बचने के बदले उनका सामना करना चाहिए। काल्पनिक दुनिया से हट कर वास्तविकता और जरूरत के मुताबिक कठिनाइयों  को सुलझाना चाहिए। कार्य-स्थल पर  टीम मे काम करना, अपनी समस्यओं  को बताना, नयी जिम्मेदारियों  को सीखना भी सहायक होती है। कुछ लोग ‘ना’ नहीं बोल पाने के कारण अपने को काम के भार तले दबा लेते है। ‘ना’कहना सीखना चाहिए।
प्राणायाम, योग, योगनिद्रा, ध्यान, मुद्रा आदि की  भी मदद  ली  जा सकती है। इससे तनावमुक्ति होती है। स्फूर्ति और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह पूरे व्यक्तित्व को सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। आयुर्वेद मे तुलसी को नर्व-टानिक तथा एंटि-स्ट्रैस कहा गया है। अतः इसका भी सेवन लाभदायक हो सकता है,पर गर्भावस्था में  बिना सलाह इसे ना लें।