अपना पीछा करते करते

अपना पीछा करते करते,

मुलाक़ात हुई अपनी परछाईं-ए-नक़्श से।

मिले दरिया के बहते पानी में अपने अक्स से।

मिले आईने में जाने पहचाने अजनबी शख़्स से।

मुस्कुरा कर कहा आईने ने –

बड़ी मुद्दतों के बाद मिली हो अपने आप से।

वक्त तो लगेगा जानने में, पहचानने में।

उलझे जीवन रक़्स में,

बिंब-प्रतिबिंब देख बे-‘अक्स

हो खो ना जाए यह शख़्स।

अर्थ – रक़्स – नृत्य

जी भर, जी ले ज़िंदगी

सारे सच लोग झूठ बताते चले गये।

सारी ज़िंदगी छले जाते रहे।

कई धोखे भरे रिश्ते निभाते चले गये।

शायद हुआ ऊपर वाले के सब्र का अंत।

हाथ पकड़ ले चला राह-ए-बसंत।

एक नई दुनिया, नई दिशा में।

बोला, पहचान बना जी अपने में।

तलाश अपने आप को, अपने आप में।

ग़र चाहिए ख़ुशियाँ और सुकून का साया।

जाग, छोड़ जग की मोह-माया।

मैं हूँ हमेशा साथ तेरे, कर बंदगी।

ख़ुशगवारी से जी भर, जी ले ज़िंदगी।

ज़िंदगी के रंग -231

ज़िंदगी के जंग में,

जब हम अपना सम्मान करना,

अपने लिए खड़े होना

सीखने लगते है।

तब कई लोग हम से

दूर हो जातें है।

वे साथ नहीं छोड़ते

क्योंकि वे कभी

साथ थे हीं नहीं।

बस दिखने लगती है

सब की फ़ितरत।

जो अपने हैं,

वो तो हमेशा

साथ खड़े मिलेंगे।

Why We Love Narcissists – Have you ever wondered why selfish, arrogant, and entitled individuals are so charming? These narcissistic people have parasitic effects on others/ society. Narcissists manipulate credit and blame in their favor.
Research by January 15, 2014

ज़िंदगी के रंग – 225

हर दिल में कितने

ज़ख़्म होते हैं….

ना दिखने वाले।

कुछ चोट, समय के

मरहम से भर जातें हैं।

कुछ रिसने वाले

नासूर बन, रूहों तक

उतर जातें हैं।

धीरे-धीरे ज़िंदगी

सिखा देती है,

दिल में राज़ औ लबों

पर मुस्कुराहट रखना।

ज़िंदगी के रंग – 224

ज़िंदगी के सफ़र में

अब जहाँ आ गए हैं।

बातें अब हम छुपाते नहीं।

लोगों के सिखाए

अदब के लिए,

अपनी ख्वाहिशें दबाते नहीं।

नक़ली सहानुभूति

दिखाने वालों से घबराते नहीं।

कड़वी बोली अब डराती नहीं।

गुनगुनी धूप

मुस्कुराना सिखाती है।

ख़ुद ज़िंदगी खुल कर

जीना सीखती है।

कद्र

कद्र

किसी के लिए सब कुछ

दिल से करो ।

फिर भी तुम्हारे वजूद

का मोल ना हो।

कद्र न हो तुम्हारी।

तब दूरियाँ हीं

समझदारी है।

लोग

लोग

ज़िंदगी की राहों में

लोगों को आने दो

….. जाने दो।

सिर्फ़ उनसे मिले

सबक़ अपना लो।

राहों में मिले टेढ़े-मेढ़े

लोग सीधे चलने की

सबक़ औ समझ दे जाएँगे।

इम्तहान

ज़िंदगी की किताब

ज़िंदगी के किताब

के पुराने पन्ने

कब तक है पढ़ना?

बीते पलों को

बीत जाने दो।

अतीत को

अतीत में रहने दो।

ज़िंदगी में आगे बढ़ो।

नए पन्नों पर कुछ

नया अफ़साना लिखो।

ज़िंदगी की किताब !!

ज़िंदगी के किताब को ना अपनी मर्ज़ी से बंद कर सकते हैं

ना आगे के सफ़ेद पन्नों को पढ़ सकते हैं।

सिर्फ़ आज़ के पन्नों से कभी कभी दिल भर जाता है!

और जाने- अनजाने अक्सर पुराने पन्ने पलट जातें हैं।

वहाँ होते हो तुम!

अज़ीज़ हो तुम,

पर नाराज़ है हम।

 बिना कहे तुम्हारे जाने से।

प्रार्थना

आँखें बंद कर हाथ जुड़ गए,

ऊपर वाले के सामने।

प्रार्थना करते हुए मुँह से निकला –

विधाता ! तुम दाता हो।

तुमसे प्रार्थना है –

जिसने मुझे जो, जितना दिया।

तुम उसे वह दुगना दो!

यह सुन ना जाने क्यों कुछ लोग नाराज़ हो गए।