जिंदगी के रंग -55

जिंदगी है या बोनसाई ?

मुट्ठी भर माटी में

लहलहाना है,

बढ़ना भी है।

हरे भी रहना है, खङे भी रहना है।

बङी अज़ीब सी है यह जिंदगी।

परिंदे

इन परिंदों की उङान देख,

चहचहाना सुन ,

रश्क होता है।

कितने आज़ाद हैं……

ना बंधन, ना फिक्र  कि …….

कौन सुनेगा ….क्या कहेगा…….

बस है खुली दुनिया अौर आजाद जिंदगी।