सूरज

थका हरा सूरज रोज़ ढल जाता है.

अगले दिन हौसले से फिर रौशन सवेरा ले कर आता है.

कभी बादलो में घिर जाता है.

फिर वही उजाला ले कर वापस आता है.

ज़िंदगी भी ऐसी हीं है.

बस वही सबक़ सीख लेना है.

पीड़ा में डूब, ढल कर, दर्द के बादल से निकल कर जीना है.

यही जीवन का मूल मंत्र है.

ज़िंदगी के रंग -200

  ज़िंदगी बङी  सख़्त और ईमानदार गुरु है.

अलग-अलग तरीक़े से पाठ पढ़ा कर इम्तिहान लेती है…..

और तब तक लेती है,

जब तक सबक़ सीख ना जाओ.

अभी का परीक्षा कुछ नया है.

रिक्त राहें हैं, पर चलना नहीं हैं.

अपने हैं लेकिन मिलना नहीं है.

पास- पड़ोस से घुलना मिलना नहीं है.

इस बार,

अगर सीखने में ग़लती की तब ज़िंदगी पहले की तरह पाठ दुहराएगी नहीं …

और फिर किसी सबक़ को सीखने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी.

कोरोना के टेस्ट में फ़ेल होना हीं पास होना है.

पर किसी के पास-पास नहीं होना है.

प्रतिबिंब

ज़िंदगी के अनुभव, दुःख-सुख,

पीड़ा, ख़ुशियाँ व्यर्थ नहीं जातीं हैं.

देखा है हमने.

हाथ के क़लम से कुछ ना भी लिखना हो सफ़ेद काग़ज़ पर.

तब भी,

कभी कभी अनमने हो यूँ हीं पन्ने पर क़लम घसीटते,

बेआकार, बेमतलब सी लकीरें बदल जाती हैं

मन के अंदर से बह निकली स्याही की बूँदों में,

भाव अलंकारों से जड़ी कविता बन.

जिसमें अपना हीं प्रतिबिंब,

अपनी हीं परछाईं झिलमिलाती है.

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं….

आँखें ख़्वाब, औ सपने बुनतीं हैं,

हम सब बुनते रहते हैं,

ख़ुशियों भरी ज़िंदगी के अरमान।

हमारी तरह हीं बुनकर पंछी तिनके बुन आशियाना बना,

अपना शहर बसा लेता है.

बहती बयार और समय इन्हें बिखेर देते हैं,

यह  बताने के लिये कि… 

 नश्वर है जीवन यह।

मुसाफिर की तरह चलो। 

यहाँ सिर्फ रह जाते हैं शब्द अौर विचार। 

वे कभी मृत नहीं होते।

जैसे एक बुनकर – कबीर के बुने जीवन के अनश्वर गूढ़ संदेश। 

 

 

बुनकर पंछी- Weaver Bird.

ज़िंदगी के रंग- 199

ज़िंदगी की परेशान घड़ियों में अचानक

किसी की बेहद सरल और सुलझी बातें

गहरी समझ और सुकून दे जातीं हैं, मलहम की तरह।

किसी ने हमसे कहा – किसी से कुछ ना कहो, किसी की ना सुनो !

दिल से निकलने वाली बातें सुनो,

और अपने दिल की करो।

गौर से सुना,  पाया……

दिल के धड़कन की संगीत सबसे मधुर अौर सच्ची है।

 

ज़िंदगी के रंग – 197

जीवन के संघर्ष हमें रुलातें हैं ज़रूर,

लेकिन दृढ़ और मज़बूत बनातें हैं.

तट के पत्थरों और रेत पर

सर पटकती लहरें बिखर जातीं हैं ज़रूर.

पर फिर दुगने उत्साह….साहस के साथ

नई ताक़त से फिर वापस आतीं हैं,

नई लहरें बन कर, किनारे पर अपनी छाप छोड़ने.

साँस के साथ बुनी गई ज़िंदगी!

साँस के साथ बुनी गई जो ज़िंदगी,

वह अस्तित्व खो गया क्षितिज के चक्रव्यूह में.

अब अक्सर क्षितिज के दर्पण में

किसी का चेहरा ढूँढते-ढूँढते रात हो जाती है.

और टिमटिमाते सितारों के साथ फिर वही खोज शुरू हो जाती है –

अपने सितारे की खोज!!!!

Image courtesy- Aneesh